• A
  • A
  • A
काल भैरव हैं कोतवाल, भोलेनाथ हैं रक्षक, विश्व प्रसिद्ध है मां गंगा की आरती, ऐसी है काशी

काशी और बनारस के नाम से विख्यात वाराणसी विश्व के प्राचीनतम जीवंत शहरों में एक है। 'वामन पुराण' के अनुसार वरूणा और असि नदियों के मध्य की भूमि ही 'वाराणसी' कहलाती है, जो सभी तीर्थयात्रियों के लिए पवित्रतम स्थान है। वाराणसी हिंदू धर्म का नाभिस्थल है। यह प्राचीन संस्कृति का परंपरागत शहर है। यहां से जुड़ी किंवदंतिया इसकी गरिमा में वृद्धि करती हैं और धर्म इसमें पवित्रता बोध पैदा करता है। जाने कब से यहां बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और साधक आते रहे हैं। वाराणसी में रहने से अपने आप ही आत्म अन्वेषण तथा शरीर एवं आत्मा के शास्वत ऐक्य का अनुभव होता है। यहां आने वाला हर यात्री विस्मित रह जाता है ।


काशी क्‍यों है इतनी पावन ?


इसे भारत की धार्मिक और सांस्‍कृतिक राजधानी कहते हैं। ये प्राचीन मोक्षदायिनी सप्‍तपुरियों में से एक है। ये भारत की सबसे पवित्र नदी, गंगा के किनारे बसी हुई है। ईसाई धर्म के लिए जो महत्‍व वेटिकन का है, इस्‍लाम में जो स्‍थान मक्‍का का है, इस शहर के लिए हिन्‍दुओं में भी वहीं आस्‍था है। ये विश्‍व का प्राचीनतम जीवंत शहर है। जी हां, हम काशी की ही बात कर रहे हैं। ये वो तीर्थ है जिसके बारे में लोक आस्‍था है कि, यहां के कण-कण में भगवान शिव का वास है और प्रलयकाल में भी इसका विनाश नहीं होता। आइए, आपको काशी के पौराणिक-धार्मिक महत्‍व से जुड़ी ऐसी ही 10 बातें बताते हैं जो शायद आप नहीं जानते।

1. चंद्रवंशी राजाओं की राजधानी
विष्‍णु पुराण में काशी का वर्णन है। वहां लिखा हुआ है कि चंद्रवंशी राजा सुहोत्र के तीन पुत्र हुए काश्‍य, काश और गुत्‍समद। इनमें काश्‍य के पुत्र काशी ही काशी के सबसे पहले चंद्रवंशी राजा हुए।

काशयस्‍य काशेय काशिराज: (विष्‍णु पुराण 4.48.13)

2. कश्‍यप ऋषि ने की शिवलिंग की स्‍थापना, ब्रह्मा ने किया प्रतिष्‍ठापित
वायुपुराण (104.75) के अनुसार भगवान् शिव के जगत प्रसिद्ध द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में से एक श्री विश्‍वेश्‍वर की प्रतिष्‍ठा यहीं काशी में है। इन्‍हें ही काशी विश्‍वनाथ के नाम से लोग जानते हैं। ऋषि कश्‍यप ने ही यहां शिवलिंग की स्‍थापना की है। इसे वेदों की भौंह में स्‍थित माना गया है। विष्‍णुपुराण के अनुसार स्‍वयं ब्रह्माजी ने यहां ज्‍योतिर्लिंग की प्रतिष्‍ठापना की है।

3. शिव कभी नहीं त्‍यागते इस शहर को
लोक विख्‍यात है कि काशी नगरी भगवान शिव को सबसे ज्‍यादा प्‍यारी है। मत्‍स्‍य पुराण के अनुसार भगवान् शिव ने माता पार्वती को बताया है कि मैं कभी इस क्षेत्र को कभी नहीं त्‍यागता, इसलिए इस क्षेत्र को 'अविमुक्‍त' क्षेत्र कहते हैं।

विमुक्‍तं न माया यस्‍मान्‍मोक्ष्‍यते वा कदाचना।
महत् क्षेत्रमिदं तस्‍मादविमुक्‍तमिदं स्‍मृतम्। (मत्‍स्‍य पुराण 180.54)



4. शिव इसलिए नहीं छोड़ते काशी
मत्‍स्‍य पुराण के अनुसार काशी को भगवान शिव का नित्‍य विहार स्‍थल कहा गया है। इसे शिवजी इसलिए नहीं छोड़ते कि एक बार ब्रह्महत्‍या पाप से पीड़त शिव कपाली बनकर सभी तीर्थों में घूमते रहे, पर यहीं आकर कपाल सहस्रों खंड में टूट गया। काशी को कपालमोचन तीर्थ भी कहते हैं।

कपाल मोचनं तिर्थमभूद्धत्‍याविनाशनम्।
मद्भवक्‍तास्‍तत्र गच्‍छन्‍ति विष्‍णुभक्‍तास्‍तथैकम्।। (मत्‍स्‍य 183.103)


5. स्‍वयं ब्रह्मा करते हैं इसकी रक्षा
यह ब्रह्मा का परम स्‍थान, ब्रह्मा द्वारा अध्‍यासित, ब्रह्मा द्वारा सदा सेवित और ब्रह्मा द्वारा रक्षित नगरी है। यहां पर किये जाने वाले स्‍नान, जप, तप होम, मरण, श्राद्ध, अर्चन सब भक्‍ति एवं मुक्‍तिदायक हैं। (अग्‍निपुराण, अध्‍याय 112)


6. प्राचीन 16 महाजनपदों में काशी
बौद्ध ग्रथ अंगुत्‍तर निकाय के अनुसार बुद्ध के काल में भारत में 16 महाजनपद मौजूद थे। इनमें काशी सबसे पहले स्‍थान पर है। अन्‍य महाजनपदों में कुरु, कोसल, अवन्‍ति, अश्‍मक, अंग, कम्‍बोज, गांधार, चेदि, वज्‍जि, वत्‍स, पांचाल, मगध, मत्‍स्‍य, मल्‍ल और सुरसेन शामिल हैं।

7. महाराज दिवोदास ने किया था नगर का विस्‍तार
महाराज दिवोदास के समय काशी नगरी क्षेमक नाम के एक दैत्‍य से आतंकित हुआ करती थी। उस वक्‍त दिवोदास ने ही उस दैत्‍य का वध किया और काशी की प्रजा को उसके अत्‍याचारों से मुक्‍ति दिलाई थी। राजा दिवोदास ने बाद में काशी नगरी का विस्‍तार किया था। काशी के इन्‍हीं प्रतापी राजा दिवोदास की सहायता से ब्रह्मा ने यहां दस अश्‍वमेध यज्ञ को संपादित किया था।

8. ये है महाश्‍मशान
महाश्‍मशान नाम से प्रख्‍यात है ये मोक्षदायिनी तीर्थ।
परं गुह्यां समरख्‍यातं श्‍मशानमिति संज्ञितम्।। (मत्‍स्‍य 184.5)


मत्‍स्‍य पुराण के ही अनुसार जो मनुष्‍य यहां यज्ञ संपन्‍न करता है उसका सैकड़ों, करोड़ों कल्‍पों में भी संसार में दुबार आगमन नहीं होता (मत्‍स्‍य 183.23-24)। मत्‍स्‍य पुराण के ही अनुसार इस अविमुक्‍त क्षेत्र सा परम पावन अन्‍य तीर्थस्‍थान संसार में न हुआ है, न होगा।

पृथिव्‍यामीदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्‍यति। (मत्‍स्‍य 183.40)

9. अयोध्‍या से मित्रता, हस्‍थिनापुर से शत्रुता
रामायण काल यानी त्रेतायुग में काशी बड़ी ही वैभवशाली नगरी थी। वाल्‍मीकि रामायण के अनुसार काशी और अयोध्‍या में गहरी मित्रता थी। महाराज दशरथ ने अपने अश्‍वमेध यज्ञ में काशी नरेश को आमंत्रित भी किया था।

तथा काशिपतिं स्‍निग्‍धं सततं प्रियवादिनम्।
सद्धत्‍तं देव संकाशं स्‍वयमेवानयस्‍व ह।। (वा. रामायण 1. 13. 23)


वहीं पांडवकाल यानी द्वापरयुग में यह नगरी हस्‍थिनापुर की शत्रु नगरी थी। क्‍योंकि, भीष्‍म ने विवाह मंडप से इस नगरी की तीन राजकुमारियों का हरण कर लिया था। (महाभारत आदिपर्व)
हालांकि कुरुक्षेत्र के युद्ध में काशीनरेश पांडवों के पक्ष में युद्धभूमि में लड़े थे।

10. मुक्‍त लोगों के चित्‍त में बसती है काशी
कूर्म पुराण के अनुसार भगवान् शिव माता पार्वती को वाराणसी की महिमा सुनाते हुए समझाते हैं कि मेरा गुह्यतम क्षेत्र वाराणसी पुरी है। यह समस्‍त तीर्थों, पुण्‍य स्‍थानों में उत्‍तम है। जो अविमुक्‍त पुरुष है, उसे यह पुरी दिखाई नहीं देती, मुक्‍त लोग ही इसे चित्‍त में देख सकते हैं। यह श्‍मशान अविमुक्‍त विख्‍यात है।

अविमुक्‍ता न पश्‍यन्‍ति: मुक्‍ता पश्‍यन्‍ति चेतसा।
श्‍मशाने मते द्विख्‍यातमविमुक्‍तमिति स्‍मृतम्।। (कूर्म पुराण 31.26-27)


उत्‍तर भारत का ये पुण्‍य तीर्थ असि तथा वरुणा नदियों के बीच का भू-भाग होने से इसे वाराणसी नाम से पुकारा गया है। मत्‍स्‍य पुराण के अनुसार यह पूर्व-पश्‍चिम की ओर दो योजन लंबी तथा दक्षिण-पश्‍चिम की ओर आधा योजन विस्‍तृत है। काशी का वाराणसी नाम भी काफी पुराना है, महाभारत के शांतिपर्व में इस नाम का उल्‍लेख मिलता है। काशी, महाश्‍मशान, आनंदवन, शिवपुरी, विश्‍वनाथ क्षेत्र आदि इसके ही नाम हैं।

बनारस के इन घाटों का है अपना मान-
कथा प्रचलित है कि भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी काशी का प्रलय में भी विनाश नहीं हो सकता है। धर्म-कर्म-मोक्ष व देवी देवताओं की वैदिक नगरी काशी सर्व विद्या की भी राजधानी मानी जाती है। यहां द्वादश ज्योतिर्लिगों में विश्वनाथ तथा 51 शक्तिपीठों में से एक विशालाक्षी स्थित है। इस नगर में कई ऐसे स्थान हैं जहां सैलानी रोमांचित हो उठते हैं। यह नगर गंगा के किनारे बसा है और इस नदी के तट पर बने धनुषाकार श्रृंखलाबद्ध घाट यहां के मूल आकर्षण हैं। इनमें कुछ घाटों का धार्मिक व अध्यात्मिक महत्व है। कुछ अपनी प्राचीनता तो कुछ ऐतिहासिकता व कुछ कला के लिहाज से खासियत रखते हैं।

अस्सीघाट: नगर के दक्षिणी छोर पर गंगा व असि नदी के संगम पर स्थित श्रद्धालुओं की आस्था व आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। यहीं भगवान जगन्नाथ का प्रसिद्ध मंदिर है।

तुलसी घाट: यहां गोस्वामी तुलसी दास ने श्रीरामचरित मानस के कई अंशों की रचना की थी। पहले इसका नाम लोलार्क घाट था।

हरिश्चंद्र घाट: सत्य प्रिय राजा हरिश्चंद्र के नाम पर यह घाट वाराणसी के प्राचीनतम घाटों में एक है। इस घाट पर हिन्दू मरणोपरांत दाहसंस्कार करते हैं।

केदार घाट: इस घाट का नाम केदारेश्वर महादेव मंदिर के नाम पर पडा है। यहां समीप में ही स्वामी करपात्री आश्रम व गौरी कुंड स्थित है।

दशाश्वमेध घाट: यह घाट गोदौलिया से गंगा जाने वाले मार्ग के अंतिम छोर पर पड़ता है। प्राचीन ग्रंथो के मुताबिक राजा दिवोदास द्वारा यहां दस अश्वमेध यज्ञ कराने के कारण इसका नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा। एक अन्य मत के अनुसार नागवंशीय राजा वीरसेन ने चक्रवर्ती बनने की आकांक्षा में इस स्थान पर दस बार अश्वमेध कराया था। इसी घाट के बगल मे राजेन्द्र प्रसाद घाट है जो देश के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की स्मृति में बनाया गया है।

मणिकर्णिका घाट: पौराणिक मान्यताओं से जुड़े इस घाट का धर्मप्राण जनता में मरणोपरांत अंतिम संस्कार के लिहाज से अत्यधिक महत्व है। इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थो में की जाती है।


पंचगंगा घाट: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां गंगा, यमुना, सरस्वती, किरण व धूतपापा नदियां गुप्त रूप से मिलती हैं। इसी घाट की सीढि़यों पर गुरू रामानंद से संत कबीर ने दीक्षा ली थी।

राजघाट: यह घाट काशी रेलवे स्टेशन से सटे मालवीय सेतु(डफरिन पुल) के पा‌र्श्व में है। यहां संत रविदास का भव्य मंदिर भी है।

आदिकेशव घाट: यह घाट वरूणा व गंगा के संगम पर स्थित है। यहां संगमेश्वर व ब्रह्मेश्वर मंदिर दर्शनीय हैं। इसके अलावा गायघाट, लालघाट, सिंधिया घाट आदि काशी के सौंदर्य को उद्भाषित करते है। नौकायन द्वारा काशी के घाटों का नजारा बरबस ही आकर्षित करता है।

इस घाट पर है शादीशुदा जोड़ों का जाना है मना: बनारस के इस घाट का निर्माण दत्तात्रेय स्वामी ने करवाया था। यह घाट परम विष्णु भक्त नारद मुनि के नाम से यानी नारद घाट के नाम से जाना जाता है। इस घाट के विषय में मान्यता है कि यहां पर जो भी शादी-शुदा जोड़े आकर स्नान करते हैं उनके बीच मतभेद बढ़ जाता है। इनके पारिवारिक जीवन में आपसी तालमेल की कमी हो जाती है और अलगाव हो जाता है।

विश्वप्रसिद्ध है काशी की गंगा आरती
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली इस भव्य गंगा आरती की शुरुआत 1991 से हुई थी। यह आरती हरिद्वार में हो रही आरती का जीता जागता उदाहरण है। हरिद्वार की परंपरा को काशी ने पूरी तरह आत्मसात किया है। सबसे पहले हरिद्वार में इस आरती की शुरूआत हुई। उस आरती को देखते हुए काशी के लोग भी बनारस के घाट पर आरती की शुरूआत की। हर शाम जब यहां गंगा आरती होती है। उस समय नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है। आज वही आरती विश्वप्रसिद्ध हो गई।

मन मोह लेंगी बनारस की मशहूर 'बनारसी साड़ियां'
बनारस की गलियों में दिन रात गूंजने वाले हथकरघे की आवाज बनारसी साड़ियों की प्रसिद्धि के पीछे की दस्तान सुनाते हैं। मशीनी युग में भी बनारसी साड़ियां हाथकरघे से ही बुनी जाती है, जो इसकी सबसे बड़ी खासियत है। वहीं साड़ी पर धातु के तारों से किया जाने वाला जरी का काम इसे विश्व-प्रसिद्ध बनाता है। पुराने समय में यह तार सोने, चांदी के हुआ करते थे, लेकिन अब मिश्र धातु व सिंथेटिक तारों का प्रयोग भी जोरों पर होने लगा है। लिहाजा बनारसी साड़ियां अब हर वर्ग के बजट में फिट है। इनकी कीमत 1500 से लेकर लाख रुपये तक है।

एक शाम बनारस के नाम-
बनारस जहां की गलियों में आज भी संस्कृति और परंपरा का रस बरसता है। गंगा किनारे बसी बाबा विश्वनाथ की नगरी को घटों और गलियों का शहर कहा जाता है। जितने घर हैं उतने मंदिर। कहते हैं काशी के कंकड़-कंकड़ में शिव का वास है। यहां भारत की सभी संस्कृतियां, परंपराएं लघु-दीर्घ रूप में जरूर मिलेंगे। और यही इसकी खासियत है। बनारस हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है तो सारनाथ बौद्धधर्मावलंबिंयों की देवभूमि। कला-संगीत और शिक्षा की भागीरथी भी यहां से निकलती है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि वाराणसी में मृत्यु होने पर सीधे मोक्ष प्राप्ति होती है। यही कारण कि लोग अपना अंतिम समय शिवधाम में बिताना चाहते हैं।

क्या खाएं: बनारस का अपना खानपान है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध व्यंजनों के साथ ही यहां देश-दुनिया के प्रसिद्ध खाने सुलभ हैं। वैसे बनारस की खासियत है यहां की लस्सी और दूध। सुबह के समय कचौरी और जलेबी खाएं और दोपहर में सादा खाना। शाम को लौंगलता के साथ समोसा और गुलाब जामुन ले सकते हैं। इसके बाद बनारस की प्रसिद्ध ठंडाई पीना और पान खाना न भूलें। बनारसी साड़ियां और सिल्क के कपड़े तो दुनियाभर में अपनी अलग पहचान रखते है। इसलिए थोड़ी खरीददारी भी करें।

कहां-कहां जाएं-

बाबा विश्वनाथ मंदिर :
गंगा के तट पर स्थित शिवलिंग 12 ज्योतिर्र्लिंगों में से एक है। तंग गलियों के बीच से होकर मंदिर तक जाना पड़ता है। मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर यहां सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई है। गली में भगवान को चढ़ाने के लिए फूल-प्रसाद के अलावा कपड़ों, रत्नों की भी दुकानें हैं। आगे पुलिस की तलाशी के बाद आप अन्नपूर्ण मंदिर के आगे से होकर बाबा विश्वनाथ मंदिर में पहुंचेगे। पंजाब के महाराजा रणीजत सिंह द्वारा स्वर्णाच्छादित कराए गए गुंबद के नीचे चांदी के अर्घे में श्यामवर्ण का शिवलिंग स्थापित है। यहां पांच बार आरती और पूजन होता है। मंदिर की व्यवस्था सरकार करती है। मंदिर सुबह 4 बजे से 11 बजे तक और फिर दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। रात 11 बजे भगवान की भव्य शयन आरती होती है। बाहर निकलकर मां अन्नपूर्णा मंदिर के दर्शन होते हैं।

ज्ञानवापी:
विश्वनाथ मंदिर के बगल स्थित मस्जिद में श्रृंगारगौरी मां की मूर्ति है। मस्जिद के बाहर मंदिर परिसर में विशाल कुंआ है और उसके बाहर विशालकाय नंदी है जो मस्जिद की ओर देख रहा है। यहां कुएं का जल लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

काल भैरव:
काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ से लगभग एक किमी दूरी पर यह मंदिर स्थित है।


दुर्गाकुंड:
आदिशक्ति मां दुर्गा का यह मंदिर पवित्र सरोवर दुर्गाकुंड के किनारे है। मान्यता है कि यहां मां की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।

तुलसी मानस मंदिर:
दुर्गाकुंड के नजदीक ही सफेद संगमरमर से बना विशाल तुलसी मानस मंदिर है। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 1964 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी। मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरित मानस की चैपाइयां लिखी है।

संकटमोचन मंदिर:
मानस मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है। यहां साल में एक बार संगीत समारोह आयोजित होता जिसमें विख्यात कलाकार प्रस्तुति देते हैं।

भारतमाता मंदिर:
कैंट स्टेशन से लगभग दो किमी दूर भारत माता को समर्पित यह एक अनोखा मंदिर है। 1936 में इस मंदिर का निर्माण बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने करवाया था। मंदिर में अविभाजित भारत का नक्शा बना है। संगमरमर से बने इस नक्शे में, मैदान, नदियों, पहाड़ों और समुद्र को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा काशी कई छोटे-बड़े अन्य मंदिर भी हैं।

घाट:
बनारस शहर को चंद्राकार घेर हुए गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी । सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है। बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती। आध्यात्म और संगीत का अनुपम संगम। सूर्याेदय और गंगा आरती देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं। यहां नाव से भी आरती का आनंद लिया जा सकता है। यहीं बीच में है मणिकर्णिका घाट। जहां से गुजरते हुए बरबस संसार के सबसे बड़े सच से साक्षात्कार होता है। कहते हैं इस महाश्मशान में जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है।
बनारस में चर्च और कई प्रसिद्ध मस्जिद भी हैं। हां, बनारस आएं है तो कबीर की जन्मस्थली, लहरतारा और रविदास मंदिर, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, भारत कला भवन, धमेक स्तूप, मूलगंध कुटी विहार देखकर ही जाएं।


कैसे आएं: बनारस आने के लिए देश के लगभग हर कोने से रेल यातायात सुलभ है। यहां का बाबतपुर हवाई अड्डा दिल्ली सहित सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। स्थानीय परिवहन के लिए ऑटो, किराए पर टैक्सी सुलभ है।

कब आएं: सभी मौसम यहां के लिए अनुकूल हैं। गर्मी के बावजूद बनारस की सुबह और शाम बहुत सुहानी होती है।



CLOSE COMMENT

ADD COMMENT

To read stories offline: Download Eenaduindia app.

SECTIONS:

  होम

  राज्य

  देश

  दुनिया

  क्राइम

  खेल

  मनोरंजन

  इंद्रधनुष

  सहेली

  गैलरी

  धर्मक्षेत्र

  टूरिज़्म

  اردو خبریں

  ଓଡିଆ ନ୍ୟୁଜ

  MAJOR CITIES