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शिव-शक्ति की पूजा से दूर होंगे कष्ट, कांगड़ा के शक्तिपीठों में श्रावणाष्टमी मेलों की धूम

कांगड़ा। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में श्रावण अष्टमी नवरात्र मेला चल रहा है। 03 अगस्त तक चलने वाले मेलों में कांगड़ा घाटी के मंदिरों में खासी भीड़ जुटती है। इन शक्तिपीठों में वर्ष के दौरान पड़ने वाले चार नवरात्र चैत्र, शरद, गुप्त तथा श्रावणाष्टमी के अवसर पर इन मन्दिरों में मां के दर्शन और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है।

श्री ब्रजेश्वरी देवी धाम।


मान्यता के अनुसार श्रावण मास में शिव की पूजा करना विशेष फलदायक होता है, लेकिन शक्ति की अराधना के बिना यह पूजन अधूरा होता है। इन शक्तिपीठों में इस साल श्रावण नवरात्र मेले का आयोजन 24 जुलाई से 03 अगस्त तक किया जा रहा है, जिसके लिये मन्दिर प्रबन्धन समिति द्वारा श्रद्घालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा के सभी पुख्ता प्रबन्ध किये गये हैं।


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यूं तो सारा साल कांगड़ा जिला के तीन मुख्य शक्तिपीठों श्री ज्वालामुखी, श्री ब्रजेश्वरी एंव श्री चामुण्डा नंदीकेश्वर धाम में श्रद्धालु आते हैं, लेकिन सभी नवरात्रों के पावन पर्व पर इन शक्तिपीठों की आभा निराली ही होती है। शक्ति पीठों से जुड़ी प्रगाढ़ आस्था के वशीभूत होकर श्रद्वालु दूर-दूर से नंगे पांव पैदल यात्रा कर, नतमस्तक होकर, ढोल नगाड़े लेकर, जय माता दी के जयकारे लगाते हुए मां के दर्शन तथा आशीर्वाद पाने के लिये पूरी श्रद्घा के साथ उमड़ पड़ते हैं।

आदिशक्ति भवानी का विरला स्वरुप

श्री ज्वालामुखी मन्दिर विश्व का पहला ऐसा तीर्थस्थल है, जहां आदिशक्ति भवानी किसी मूर्त रूप में न होकर, साक्षात ज्योति के रूप में विराजमान है। इस मन्दिर में नवदुर्गा के रूप में नौ ज्योतियां प्राकृतिक रूप से आदिकाल से निरन्तर प्रज्जवलित हो रही हैं और श्रद्घालु इन ज्योतियों का दर्शन पाकर अपना सौभाग्य मानकर पुण्य प्राप्त करते हैं।

जब सम्राट का अभिमान हुआ चूर-चूर

इस शक्तिपीठ का इतिहास सोलहवीं शताब्दी के मुगल साम्राज्य से भी जुड़ा है। जनश्रुति के अनुसार मुगल सम्राट अकबर ने मां ज्वालाजी की परीक्षा के लिये ज्योति को बुझाने हेतू नहर, तबे इत्यादि का प्रयोग किया। परन्तु ज्योति ज्यों कि त्यों प्रज्वलित रही। अकबर सम्राट ने मां ज्वालाजी से क्षमा मांग कर अभिमान स्वरूप सोने का छत्र भेंट किया। परन्तु इसे चढ़ाते ही छत्र अधातु बन गया तथा मुगल सम्राट अकबर का अभिमान चूर-चूर हो गया। यह छत्र धरोहर के रूप में आज भी मन्दिर में श्रद्घालुओं के दर्शनार्थ मौजूद है। माता के हर गुणगान में अकबर के घमण्ड के चूर होने का उल्लेख मिलता है।

अन्य स्वयंसिद्घ धाम भी

नंगे-नंगे पैरी मां अकबर आया, तवा फाडक़र निकली ज्वाला अकबर शीष नवाया इत्यादि पंक्तियां सोलहवीं शताब्दी से आज तक मां की गाथाएं लोकगीतों के रूप में गाई जाती हैं। ज्वालाजी मंन्दिर परिसर में नौ ज्योतियों के अतिरिक्त गोरखडिब्बी, राधाकृष्ण मन्दिर, तारामन्दिर, लाल शिवालय, पिलकेश्वर, टेड़ा मन्दिर, नागार्जुन, अम्बिकेश्वर, गणेश, भैरव इत्यादि मन्दिर मौजूद हैं।

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श्री ब्रजेश्वरी धाम कांगडा में मां भवानी पिंडी रूप में अवस्थित हैं। यह मन्दिर सर्वधर्म का परिचायक है जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख एवं ईसाई धर्म वास्तु शैली स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। इसी प्रकार श्री चामुण्डा नंदिकेश्वर धाम में माता चामुण्डा मूर्ति रूप में विद्यमान हैं और इसके साथ गुफा में भगवान शिव परिवार सहित शिवलिंग एंव अन्य देवताओं मूर्तियों के साथ विराजमान हैं। मन्दिर के साथ धौलाधार पर्वत से निकलने वाली नदी बाण गंगा श्रद्वालुओं के लिये स्नान एंव आर्कषण का केन्द्र है। मन्दिर के साथ बना शमशान घाट इस तीर्थ स्थल की अनेक दंत कथाओं को दर्शाता है ।

यात्रियों के लिये पुख्ता प्रबन्ध

श्रावण अष्टमी नवरात्र मेले के लिये सभी आवश्यक प्रबन्ध किये गए हैं। इन तीर्थ स्थलों पर सुरक्षा के व्यापक प्रबन्ध किए गए हैं, ताकि किसी प्रकार की कोई अप्रिय घटना होने की कोई संभावना न रहे।
इसके अतिरिक्त मेले में यात्रियों की सुविधा के लिये ठहरने, पर्याप्त पानी, शौचालय तथा पार्किंग व्यवस्था इत्यादि के पुख्ता प्रबन्ध किए गए हैं जिससे कि बाहर से आने वाले यात्रियों को कोई असुविधा न हो। जिला प्रशासन द्वारा मेले के दौरान इन शक्तिपीठों में शांति तथा सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिगत सम्बन्धित क्षेत्र में आग्नेय, धारदार शस्त्र तथा विस्फोटक सामग्री उठाने पर पूर्ण पाबन्दी लगाई गई है।



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