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इस पेड़ से अपने-आप निकलता है पानी, लेकिन कैसे? ये नहीं जान पाया आज तक कोई भी, क्योंकि...

चंडीगढ़। दरअसल जर्नलिज्म का एक उसूल होता है कि सही स्टोरी की तलाश हमेशा जारी रखी जाए। बहरहाल आज आपके लिए एक ऐसी ही अनोखी कहानी को लेकर आए हैं हम।

प्राचीन कालीन शिव मंदिर (फाइल फोटो)


कहते हैं ना कि ढूंढ़ने से इंसान को बड़ी से बड़ी और मुश्किल से मुश्किल चीज़ मिल जाती है, एक ऐसे ही खोए हुए खज़ाने का पता चला है दक्षिणी हरियाणा में फैली अरावली की वादियों में।


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असल में हम आपको बताने वाले हैं कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से कुछ ही दूरी पर, हरियाणा के नूंह ज़िले से केवल 3 किलोमीटर दूर, प्राचीन अरावली पर्वतमाला की जड़ों में एक ऐसा मंदिर है, जहां पर अरावली पहाड़ से क़रीब 100 मीटर की ऊंचाई पर कंदब के पेड़ से क़ुदरती तौर पर, अपने-आप पानी निकलता है।

हैरतअंगेज़ बात ये है कि आज तक कोई भी इस बात का पता लगाने में कामयाब नहीं हो सका है कि आख़िर ये पानी आता कहां से है? ये भी कम मज़ेदार नहीं कि पेड़ से टपकने वाला ये पानी साल के 365 दिन बहता रहता है।

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कहने का मतलब साफ़ है कि ये पानी ना तो मौसम का मोहताज है और ना ही इसे इस बात की ही परवाह है कि मेरे पानी को कौन पी रहा है, बस ये तो सदियों से अपनी धुन में बहता जा रहा है। पेड़ से निकलने वाले इस चमत्कारी पानी को लोग अपने घरों को ले जाते हैं। लोगों का ऐसा यक़ीन है कि इस पानी से चर्म रोग हमेशा के लिए ख़त्म हो जाते हैं।


कदंब के इस पेड़ से निकलता है कु़दरती तौर पर पानी

गौरतलब है कि स्थानीय लोग इस मंदिर को नल्हड़ेश्वर मंदिर के नाम से जानते-पहचानते हैं और आदर के साथ मानते भी हैं।

स्थानीय लोगों की मानें तो यही मंदिर एक ज़माने में पांडवकालीन शिव मंदिर के नाम से मशहूर था, लेकिन अरावली की जड़ों में बसे मुस्लिम आबादी वाले नल्हड़ गांव के निवासियों ने इस मंदिर को गांव के साथ जोड़ते हुए नल्हड़ेश्वर मंदिर का ख़िताब दे दिया। हालांकि अभी भी दूर-दराज़ के पर्यटक इसको पांडवकालीन शिव मंदिर के रूप में ही ज़्यादा जानते हैं।

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इस मंदिर की तामीर के शुरुआती दौर में यहां पर रहने वाले और आने-जाने वाले ऋषि, मुनियों और मंदिर की देख-रेख में जुटे लोगों के लिए नल्हड़ गांव के लोग खाना मुहैया करवाते थे, क्योंकि मंदिर के आस-पास बहुत ज़्यादा आबादी नहीं थी। इस बात को कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि नल्हड़ेश्वर मंदिर की नींव को मज़बूत बनाने में कहीं ना कहीं नल्हड़ गांव के लोगों ने अहम् क़िरदार निभाया है।


नल्हेड़श्वर मंदिर का अंदर का दृश्य (फाइल फोटो)

ऐसी मान्यता भी है कि पांडवों ने वनवास के दौरान अरावली की इन्हीं खूबसूरत पहाड़ियों में काफ़ी दिन बिताए थे। ये भी विश्वास है कि उसी समय से यहां शिवलिंग मौजूद है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस भौगोलिक रूप से प्राचीन मंदिर में हर साल मेला लगता है, इस मेले में आस-पास के तमाम समुदायों के लोग शिरकत करते हैं।

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उल्लेखनीय है कि इस शिव मंदिर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कई दशक से उठती आ रही है, जिसको पिछले दिनों हरियाणा के मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने मानते हुए कहा कि वे इस मंदिर के कायाकल्प करने के बारे में केंद्र को सिफारिश करेंगे, हालांकि ये अलग बात है कि अभी तक उनके वादे पर किसी भी तरह का अमल नहीं हो सका है।

-एम. जु़बेर खान


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