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'राम' और 'सलीम' की मां का है आज जन्मदिन, 200 फिल्मों में कर चुकीं हैं अभिनय

नई दिल्ली। क्या आपको फिल्मकार के. आसिफ की बहुचर्चित फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में सलीम की मां जोधाबाई का किरदार याद है? यह दमदार और यादगार भूमिका निभाने वाली दुर्गा खोटे का आज यानि 14 जनवरी को जन्मदिन है।

स्व. दुर्गा खोटे


दरअसल, मुगल-ए-आजम से प्रसिद्ध हुईं पद्मश्री दुर्गा खोटे रंगमंच की दुनिया में करीब पांच दशक तक सक्रिय रहीं। मूक फिल्मों के दौर में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाली दुर्गा की पहली फिल्म 'फरेबी जाल' थी।
फिल्मी दुनिया का सर्वोच्च सम्मान भी मिला


भारतीय सिनेमा में बेमिसाल योगदान के लिए उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। एक नजर उन्हें मिले अन्य सम्मान पर:
  • वर्ष 1968 में दुर्गा खोटे पद्मश्री से सम्मानित हुईं।
  • वर्ष 1958 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
  • फिल्म 'विदाई' में बहेतरीन अभिनय के लिए उन्हें वर्ष 1974 में सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।
रील लाइफ की मां : दुर्गा खोटे
दुर्गा खोटे ने 200 फिल्मों के साथ ही सैकड़ों नाटकों में भी अभिनय किया और फिल्मों को लेकर समाज द्वारा तय वर्जनाओं को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई। हिंदी फिल्मों में उन्हें विशेष रूप से मां की भूमिका के लिए याद किया जाता है।

'कैकेई' के रूप में याद करते हैं लोग

सन् 1936 में बनी फिल्म 'अमर ज्योति' में उन्होंने सौदामिनी की भूमिका निभाई, जो उनके सबसे यादगार भूमिकाओं में से एक है। उन्होंने विजय भट्ट की फिल्म 'भरत मिलाप' (1942) में कैकेई की भूमिका को जीवंत बना दिया। उनके बेमिसाल अभिनय को आज तक लोग याद करते हैं।

एक नजर दुर्गा खोटे द्वारा बतौर मां अभिनीत फिल्मों पर:
  • 'चरणों की दासी'
  • 'मिर्जा गालिब'
  • 'बॉबी',
  • 'विदाई'
  • 'चाचा भतीजा'
  • 'जय बजरंगबली',
  • 'शक'
  • अभिमान,
  • 'बावर्ची'
  • 'पापी'
  • 'कर्ज'
  • 'पहेली'
  • 'चोर सिपाही'
  • 'साहेब बहादुर'
  • 'राजा जानी'
इनके अलावा दुर्गा ने कई अन्य फिल्मों में भी शानदार और कई यादगार किरदार निभाए हैं। हिंदी के अलावा मराठी फिल्मों की भी वह प्रसिद्ध अभिनेत्री रही हैं।

स्नातक तक शिक्षित थीं दुर्गा खोटे,
आत्मकथा भी लिखी
14 जनवरी, 1950 में मुंबई में पिता पांडुरंग लाउद और माता मंजुलाबाई के घर जन्मीं दुर्गा कैथ्रेडल हाई स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज में शिक्षित हुईं। उन्होंने सेंट जेवियर्स से स्नातक की डिग्री भी हासिल की थी। दुर्गा खोटे ने मराठी में अपनी आत्मकथा 'मी दुर्गा खोटे' (हिन्दी अनुवाद 'मैं दुर्गा खोटे' नाम से प्रकाशित) में उन्होंने अपने जीवन की मर्मस्पर्शी घटनाऐं विस्तार से बयान की हैं।

आर्थिक संबल के लिए चुनी फिल्में
दुर्गा खोटे का शुरुआती जीवन तो सुखमय रहा, लेकिन बाद में उन मात्र 26 साल की उम्र में उनके पति का निधन हो गया। इसके बाद उनका घरेलू जीवन बहुत ही कठिन और दुखों से भरा रहा। पति के निधन के बाद उन पर दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गई थी। ऐसे में उन्होंने आर्थिक संबल के लिए फिल्मों की राह पकड़ी।

रूढ़िवाद तोड़कर पाई सफलता

हालांकि, उस दौर की फिल्मों में महिलाओं की भूमिका भी ज्यादातर पुरुष ही निभाते थे। ऐसे में महिलाएं पर्दे में ही रहा करती थीं, फिल्मी पर्दे पर आना या अभिनय को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। फिर भी दुर्गा खोटे ने रूढ़िवाद से आगे बढ़कर साहस दिखाया और कामयाबी उनके कदम चूमती रही।

निधन के 26 साल बाद भी प्रेरणा हैं दुर्गा
हिंदी और मराठी फिल्मों के अलावा रंगमंच की दुनिया में करीब पांच दशकों तक सक्रिय रहीं दुर्गा खोटे का 22 सितंबर, 1991 को निधन हो गया। इस दुनिया को अलविदा कहने के बावजूद दुर्गा सिने प्रेमियों की स्मृतियों में हमेशा बनी रहेंगी और आनेवाली पीढ़ियों को प्रेरित करेंगी।

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