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'कोस मीनारें' सिर्फ़ 'कोस मीनारें' नहीं हैं! हमारी हिस्ट्री, ज्यॉग्राफी और सोशियोलॉजी भी हैं...

चंडीगढ़/दिल्ली। अगर कभी आपने जी टी रोड (कोलकाता से पेशावर) पर सफ़र किया हो, तो आप देखेंगे कि सड़क के बराबर कुछ-कुछ दूरी पर पुराने ज़माने की मीनारें बनी हुई हैं, इन्हें 'कोस मीनार' कहा जाता है।

डिज़ाइन फोटो


'कोस' शब्द दूरी नापने का एक पैमाना है। 'कोस' का शाब्दिक अर्थ है - 'दूरी की एक माप जो लगभग दो मील यानि सवा तीन किलोमीटर के बराबर होती है।'

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आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के मुताबिक दूरी और दिशा की जानकारी देने के लिए कोस मीनारों की तामीर अपने ज़माने के बेहद क़ाबिल और सामाजिक सरोकारों में दिलचस्पी रखने वाले शेरशाह सूरी ने करवाया था। हालांकि बाद में मुग़ल बादशाहों ने कोस मीनारों की परंपरा को सिलसिलेवार तरीक़े से आगे बढ़ाया था।

आपको बता दें कि 1 कोस करीब 3 किलोमीटर के बराबर होता है। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में दूरी कोस में ही नापी जाती थी। याद रहे कि कोस मीनार हरियाणा के अलावा बंगाल के गांव सोनार से लेकर आगरा, मथुरा, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब के क्षेत्रों से होते हुए पाकिस्तान के पेशावर शहर तक बनी हुई हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार हरियाणा में कुलमिलाकर 49 कोस मीनारें हैं।

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इन कोस मीनारों से यात्रियों को रास्ता पहचानने व दूरी नापने में मदद मिलती थी। इन कोस मीनारों पर प्रशासन की ओर से एक 'अश्वारोही संदेशवाहक' और 'शाही सैनिकों' की नियुक्ति होती थी, जो शाही संदेश और पत्र को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने का काम करते थे।

भारत में खत भेजने की व्यवस्था इसी समय से शुरु हुई थी, यही वजह है कि शेरशाह सूरी को भारत की डाक सेवा का जन्मदाता माना जाता है। कोस मीनारों में एक बड़ा नगाड़ा भी रखा जाता था जो हर एक घंटे के खत्म होने पर बजाया जाता था। कोस मीनारों के पास मौजूद सरायों पर मुसाफ़िर आराम किया करते थे।

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विदेशी यात्री इब्नबतूता के लेखों से पता चलता है कि 'कोस मीनारों के पास हमेशा से एक कुआं या बावड़ी होती थी, जहां पर कुछ देर बैठकर आराम किया जा सके और पानी पीकर प्यास बुझाई जा सके। हर मीनार के पास हरे-भरे पेड़ भी ज़रूर होते थे, जिससे छाया में बैठकर राहगीर आराम कर सकें, इन मीनारों पर राजदरबार की तरफ से आदमी नियुक्त होते थे, ये दिन में लोगों की सेवा करते थे और रात में मीनार के ऊपर रोशनी करते थे, जिससे रात में भटके राहगीर को रास्ता मिल जाए।'


शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित जर्जर हालत में कोस मीनार

आधुनिक युग में कोस मीनारों की हालत को देखकर बड़ा दुखा होता है क्योंकि ज़्यादातर कोस मीनारों जर्जर हो चुकी हैं। करनाल के रहने वाले जगदीश कुमार की मानें तो प्रशासन और सरकार की उदासीनता की वजह से करनाल शहर के पास मौजूद ऐतिहासिक कोस मीनार के आस-पास घास उग आई है, और दीवारों टूटती जा रही हैं।

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उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने इन कोस मीनारों को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया है तथा अधिनियम 1958 (24) के अनुसार इन्हें हानि पहुंचाना दंडनीय अपराध है।


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