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छात्र-छात्राओं के आएंगे 'अच्छे दिन'!, शिक्षा का अधिकार कानून में होगा बड़ा संशोधन

नई दिल्ली। संसद की एक समिति ने पढ़ाई के तरीके को सुधारने को लेकर एक सुझाव दिया है। उनका मानना है कि बच्चों में पठन-पाठन के स्तर और परिणाम को बेहतर बनाने के लिये पांचवी एवं आठवीं कक्षा में परीक्षा ली जानी चाहिए।

प्रतीकात्मक फोटो।

राज्यसभा सांसद डॉ. सत्यनारायण जटिया के नेतृत्व वाले मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति ने अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार दूसरा संशोधन विधेयक 2017 पर विचार किया है। यह विधेयक 11 अगस्त 2017 को लोकसभा में पेश किया गया था और इसे 22 अगस्त 2017 को स्थायी समिति को भेज दिया गया था।


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समिति ने संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आरटीई अधिनियम के उपबंध 2(1) में प्रस्तावित संशोधन का स्वागत किया है, जिसमें प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के अंत में पांचवी एवं आठवीं कक्षा में नियमित परीक्षा का प्रस्ताव किया गया है। समिति महसूस करती है कि इससे भविष्य में बच्चों के पठन-पाठन का स्तर बेहतर होगा।

समिति विभाग के उस विचार का स्वागत करती है कि पांचवी या आठवीं कक्षा या दोनों में रोकना या नहीं रोकने का विषय राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों पर छोड़ देना चाहिए।

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समिति ने हालांकि सुझाव दिया है कि किसी बच्चे को कक्षा में रोकने के संबंध में सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को साझा दिशानिर्देश जारी किया जा सकता है।

इस कारण से पढ़ाई हुई प्रभावित
समिति ने पाया है कि आरटीई अधिनियम लागू होने के बाद से प्रारंभ में पूरा ध्यान छह से 14 वर्ष के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा प्रणाली पर दिया गया और इसके तहत दाखिला, स्कूली इमारत, आधारभूत संरचना आदि पर जोर दिया गया। ऐसा करते हुए शिक्षण एवं पठन-पाठन का विषय पीछे चला गया। इसके कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि अब अधिनियम की समीक्षा की जरूरत महसूस हुई है।

उल्लेखनीय है कि देश के 23 राज्यों ने स्कूलों में पांचवी एवं आठवीं कक्षा में फेल नहीं करने की नीति में संशोधन करने का समर्थन किया है और इनमें से आठ राज्यों ने इस नीति को पूरी तरह से वापस लेने का पक्ष लिया है।

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स्कूलों में फेल नहीं करने की नीति के विषय पर विचार करने के लिये 26 अक्टूबर 2015 को राजस्थान के शिक्षा मंत्री के नेतृत्व में एक उप समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने छह से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क एवं
अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून के तहत इस नीति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया था।

पांच राज्यों में फेल नहीं करने की नीति को सपोर्ट
15 एवं 16 जनवरी को राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (केब) की बैठक में इस बारे में उप समिति की स्थिति रिपोर्ट पर विचार किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, पांच राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और तेलंगाना ने आरटीई अधिनियम 2009 के तहत फेल नहीं करने की नीति को बनाये रखने की बात कही थी।

जबकि बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, केरल, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और अरूणाचल प्रदेश ने फेल नहीं करने की नीति को वापस लिये जाने पर जोर दिया है।

इन राज्यों ने संशोधन का दिया सुझाव, कुछ ने साधी चुप्पी
हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, पुडुचेरी, दिल्ली, ओडिशा, त्रिपुरा, गुजरात, नगालैंड, मध्यप्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, जम्मू कश्मीर, छत्तीसगढ़, दमन दीव ने इस नीति में संशोधन करने का सुझाव दिया है।

अंडमन निकोबार, असम, दादरा नगर हवेली, झारखंड, लक्षद्वीप, मणिपुर, मेघालय और तमिलनाडु ने इस विषय पर कोई राय नहीं दी।

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मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, केब की बैठकों में इस विषय पर चर्चा की गई और इसके अनुरूप छह से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के प्रावधानों में संशोधन करने का निर्णय किया गया ताकि पांचवी एवं आठवीं कक्षा में नियमित परीक्षा आयोजित की जा सके।

फेल होने के 2 महीने बाद दोबारा देनी होगी परीक्षा
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अगर कोई बच्चा इस परीक्षा में फेल हो जाता है तब उसे परिणाम घोषित होने के दो महीने के भीतर दोबारा परीक्षा देने का मौका मिलेगा। अगर छात्र दूसरे अवसर में भी फेल हो जाता है तब उपयुक्त सरकार स्कूल को पांचवी या आठवीं कक्षा या दोनों कक्षाओं में ऐसे छात्रों को रोकने की अनुमति दे सकती है। लेकिन किसी भी छात्र को स्कूल से नहीं निकाला जा सकेगा।

गौरतलब है कि वर्ष 2010 में यह व्यवस्था की गयी थी कि पांचवीं और आठवीं कक्षा की पढ़ाई में बच्चों को रोका नहीं जायेगा।

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