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अयोध्या मामले की सुनवाई कर चुके पूर्व जज ने सुझाया समाधान

नई दिल्ली: अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति भंवर सिंह ने एक सुझाव दिया है. उनके अनुसार क्योंकि यह मुद्दा आस्था से जुड़ा है, लिहाजा वहां पर मंदिर और मस्जिद दोनों ही बनाने की इजाजत दी जानी चाहिए, ताकि यह मसला हमेशा-हमेशा के लिए सुलझ जाए.

सेवानिवृत्त जस्टिस भंवर सिंह से खास बातचीत.


ईटीवी भारत से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान जस्टिस भंवर सिंह ने माना कि 2003 की एएसआई रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मिलने की पुष्टि हुई थी.
क्या है हाईकोर्ट का आदेश जस्टिस भंवर सिंह ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय बिल्कुल सही था, जिसमें कोर्ट ने जमीन के इस टुकड़े को तीन भागों में विभाजित कर तीनों पक्षों में बांटने का आदेश सुनाया था. बता दें कि ये आदेश वर्ष 2010 में पारित किया गया था.


जमीन का सर्वे कैसे हुआ उन्होंने भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख में कराए गए मैग्नेटिक सर्वे का भी जिक्र किया. जस्टिस सिंह ने बताया कि इस सर्वे में जमीन के हर इंच की जांच की गई थी. इसकी प्रक्रिया ऐसी थी कि अगर मैग्नेट लगी एक्स-रे मशीन जमीन के भीतर जाने के बाद बाहर न आए तो वहां कुछ बरामद नहीं हुआ. हालांकि, अगर मैग्नेट बाहर आ जाए तो ऐसा माना गया कि जमीन के नीचे कुछ है.

आम सहमति से सुलझेगा केस जस्टिस सिंह ने कहा कि समाधान के रास्ते में मुख्य अवरोधक कुछ लोगों की कट्टरवादी विचारधारा है. उनके अनुसार अगर संबंधित पक्ष आपस में सहमति बना लें, तो इसका हल निकालना मुश्किल नहीं होगा.

पांच वर्षों तक हुई सुनवाई बता दें कि जस्टिस भंवर सिंह की अदालत में वर्ष 2002 से 2007 तक इस मामले की सुनवाई की गई थी. इस समय ये केस इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में लंबित था.

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