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एक दिन की 'कलेक्टर साहिबा' का अपमान, न कुर्सी मिली, न सम्मान

बिलासपुर। एक दिन के लिए बिलासपुर की शेडो कलेक्टर बनी चेतना देवांगन को इस बात का एहसास आज हो गया होगा कि अफसर बनना और अफसरशाही का सामना करना दोनों अलग-अलग चीज है। शेडो कलेक्टर बनी चेतना देवांगन को अपमानित होना पड़ा है।

चेतना जैन, शेडो कलेक्टर


चेतना को आज ठीक उसी अंदाज में सम्मान मिलना चाहिए जैसे सामान्य तौर पर एक कलेक्टर को मिलती है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उन्हें बड़ी कुर्सी में बैठने के बदले छोटी कुर्सी में बैठना पड़ा। चेतना सिर्फ आज एक औपचारिक कलेक्टर के रूप में नजर आईं और अफसरों की सामंती सोच ने चेतना को उपेक्षित ही रखा।


चेतना को रिसीव करने कोई नहीं पहुंचा

शेडो कलेक्टर की भूमिका निभाने पहुंचीं चेतना देवांगन को महज एक घंटे में अफसरशाही का सामना करना पड़ा। उन्हें बड़ी कुर्सी में बैठने के बदले अपमानित होना पड़ा। अंत में उन्हें छोटी कुर्सी ही नसीब हुई। चेतना जब कलेक्ट्रेट पहुंची तो उन्हें रिसीव करने वाला भी कोई अफसर नहीं था। अलबत्ता चपरासी ने बुके थमा कर स्वागत करने की औपचारिकता का निर्वाह किया।

शेडो कलेक्टर को नहीं मिली तवज्जो

कलेक्ट्रेट में प्रवेश और मंथन सभाकक्ष में भी उनके साथ जो हुआ वो चेतना के चेहरे पर उदासी के भाव के रूप में साफ-साफ दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि वो मन ही मन खुद को अपमानित महसूस कर रही हो। कोने में एक छोटी सी कुर्सी पर बैठकर वो चुपचाप अफसरों की बात सुनती रही और उन्हें दूसरे तमाम अफसरों से ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रहा था।

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राज्य शासन द्वारा चयनित बिलासपुर जिले की शेडो कलेक्टर चेतना देवांगन सुबह करीब 11 बजे मंथन सभाकक्ष में पहुंचीं। वहां कलेक्टर पी दयानंद की कुर्सी के बगल में बड़ी कुर्सी रखी हुई थी। शेडो कलेक्टर की भूमिका में पहुंची चेतना को कलेक्टर के बगलवाली कुर्सी पर बैठना पड़ा।

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कुछ अधिकारी आते रहे, जिन्हें उन्होंने अपना परिचय दिया। इस दौरान फोटो खींचने का सिलसिला भी चला। वीडियो भी शूट हुआ। करीब 15 मिनट बाद जिला पंचायत सीईओ फरिहा आलम सिद्दीकी मंथन सभाकक्ष में पहुंचीं।

बार-बार कुर्सी से उठाया

कलेक्टर के लिए लगी कुर्सी के पास पहुंचते ही उन्होंने चेतना को कुर्सी से उठवा दिया। कहा-दूसरी कुर्सी में बैठो। वह दूसरी कुर्सी में बैठी ही थी कि जिला पंचायत सीईओ सिद्दीकी की नजर उस पर पड़ गई, वह कुर्सी भी बड़ी थी। अलबत्ता उस कुर्सी से भी उसे उठवा दिया गया। फिर उनके लिए अलग से एक छोटी कुर्सी मंगाई गई। छोटी कुर्सी में चेतना के बैठते ही सीईओ ने बैठक लेनी शुरू की। उस समय कलेक्टर पी दयानंद हाईकोर्ट गए थे।


दोपहर में करीब साढ़े 12 बजे वे हाईकोर्ट से कलेक्टोरेट लौटे और मंथन सभाकक्ष पहुंचकर बैठक में मातहत अफसरों से जवाब-तलब करना शुरू किया। आज जो कुछ भी चेतना के साथ हुआ वो अफसरों के लिए भले ही सामान्य बात क्यों ना हो लेकिन सही मायने में यह किसी युवा के महत्वाकांक्षा को कुचलने जैसा था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज जब राज्य शासन द्वारा चयनित एक शेडो कलेक्टर के सम्मान की रक्षा भी तमाम अफसर नहीं कर पाए तो इनका रवैया जनसाधारण के लिये कैसा होता होता होगा।

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