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क्रिसमस और नया साल मनाना है तो चले आइए मदकू द्वीप, हम बता रहे हैं खासियत

रायपुर/ मुंगेली। नया साल आने वाला है, क्रिसमस भी नजदीक है ऐसे में आप अगर कहीं घूमने का मूड बना रहे हैं तो रुख करिए छत्तीसगढ़ के मदकू द्वीप का। प्राकृतिक सौंदर्य समेटे इस द्वीप को देखकर आप मोहित हो जाएंगे। इस द्वीप पर हिन्दू और ईसाई धर्म के मानने वालों के कुछ दार्शनिक स्थल भी हैं।

मदकू द्वीप पर मंदिर


सर्दियों के मौसम में अगर वीकेंड में आप कहीं घूमने जाना चाहते हैं। गुलाबी ठंड के साथ कैंप फायर करने का मन है तो छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में स्थित मदकू द्वीप बेहतर जगह हो सकती है। क्रिसमस या नए साल में तो यहां जगह और खास है क्योंकि यहां हिन्दू और ईसाई दोनों धर्मों के लिए खास मान्यता है।


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पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप
बिलासपुर शहर से 39 किमी दूर बैतलपुर के पास शिवनाथ के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह है मदकू द्वीप। इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यहां दो धर्मों के आस्था का संगम है। यहां ईसाई धर्म को मानने वालों का मेला भी लगता है तो वहीं सदियों से यह स्थान हिन्दू मान्यताओं के लिहाज से बेहद पवित्र है। यहां शिवनाथ नदी की धाराएं ईशान कोण में बहती हैं। वास्तु शास्त्र के हिसाब से यह दिशा सबसे पवित्र मानी जाती है।

मांडूक्य ऋषि की तपोभूमि

24 हेक्टेयर में फैले मदकू द्वीप के पास ही एक और छोटा द्वीप 5 हेक्टेयर का है। दोनों के द्वीपों के बीच टूरिस्ट बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। जैव विविधता से परिपूर्ण द्वीप में माइक्रो क्लाइमेट (सोला फॉरेस्ट) निर्मित करता है। यहां विशिष्ट प्रजाति के वृक्ष पाए जाते हैं। इसमें चिरौट (सिरहुट) के सदाबहार वृक्ष प्रमुख हैं।

यहां से जाते हैं मदकू द्वीप
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बिलासपुर हाइवे पर कोई 80 किलोमीटर दूर है बेतलपुर गांव। यहां से मदकू द्वीप के लिए रास्ता मुड़ता है। लगभग चार किमी का यह सिंगल रोड बारिश में जगह-जगह से उखड़ रहा है।
नदी पर बना एनीकट का रपटा बारिश के मौसम में डूब जाता है। उस पर चल कर मदकू के टापू पर पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा है। लेकिन अभी आप वहां जाएंगे तो नदी की शीतलता और कुदरती माहौल का लुत्फ उठा सकते हैं।
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शिवनाथ नदी के पानी से घिरा मदकू द्वीप आम तौर पर जंगल जैसा ही है। बताते हैं, शिवनाथ नदी के बहाव ने मदकू द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्सा लगभग 35 एकड़ में है, जो अलग-थलग हो गया है। दूसरा करीब 50 एकड़ का है, जहां 2011 में उत्खनन से पुरावशेष मिले हैं।

रास्ते में हैं कई मंदिर
नदी किनारे से पुरावशेष के मूल अकूत खजाने तक पहुंचने की पगडंडी के दोनों पेड़ों के घने झुरमुट हैं। यहां नदी से बहते पानी की कलकल आती आवाज रोमांचित करती हैं। चलते-चलते जैसे ही पुरातत्व स्थान का द्वार दिखता है, हमारी उत्सुकता भी शिवनाथ नदी की माफिक उफान पर होती है।

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मुख्य द्वार से अंदर पहुंचते ही दायीं तरफ पहले धूमेश्वर महादेव मंदिर और फिर श्रीराम केवट मंदिर आता है। थोड़ी दूर पर ही श्री राधा कृष्ण, श्री गणेश और श्री हनुमान के प्राचीन मंदिर भी हैं। सबसे अहम बात आप मदकुदीप जाने का प्लान बनाते है तो विश्वप्रसिद्ध ताला यानी देवरानी जेठानी मंदिर भी जा सकते हैं यह जगह यहां से बेहद करीब है।

मदकू द्वीप से सुर्यास्त का नजारा

अधिकांश लोगों का लक्ष्य 19 मंदिरों के उन समूह को देखने का होता है। जो 11वीं सदी के कल्चुरी कालीन पुरावैभव की कहानी बयां करते हैं। यहां उत्खनन के साक्षी रहे छत्तीसगढ़ के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पर्यवेक्षक प्रभात कुमार सिंह ने एक पुस्तक में वर्णन किया है। इसे मांडूक्य ऋषि की तपोस्थली के रूप में तीन दशक पहले प्रोफेसर डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने चिन्हित किया था। संभवत: यही पर ऋषि ने माण्डूक्योपनिषद् की रचना की। संविधान में समाहित किए गए सत्यमेव जयते भी इसी महाकृति के प्रथम खंड का छठवां मंत्र है।

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बताते हैं, पुरा मंदिरों के समूह वाला गर्भगृह पहले समतल था। जब खुदाई हुई तो वहां 19 मंदिरों के भग्नावशेष और कई प्रतिमाएं बाहर आईं। इसमें 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक मंदिर क्रमश: उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले हैं। खुदाई के बाद वहां बिखरे पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया।

कैसे पहुंचे?
मदकू द्वीप शिवनाथ नदी की धारा के दो भागों में विभक्त होने से द्वीप के रुप में विद्यमान प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर अत्यंत प्राचीन रमणीय स्थल है। इसे मडकू, मदकू या मनकू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। रायपुर–बिलासपुर राजमार्ग पर 76 किलोमीटर या बिलासपुर–रायपुर मार्ग पर 37 किलोमीटर पर बैतलपुर स्थित है।

मंदिर

बैतलपुर से लगभग 4 किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी के तट पर स्थित द्वीप पर जल मार्ग से जाया जा सकता है। इसके अलावा निपानिया से 9 किलोमीटर दूर या भाटापारा से 26 किलोमीटर दूर कड़ार-परसवानी मार्ग से इस द्वीप पर सड़क से जा सकते हैं। इस द्वीप पर एक प्राचीन ध्वस्त शिव मंदिर एवं कई स्थापत्य खंड पाये गये हैं। यहां रायपुर और बिलासपुर से सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं। यहां ठहरने के लिए सरकारी रेस्ट हाउस के अलावा आसपास कई होटल भी हैं।

2011 में हुआ था खनन
मदकूद्वीप में राज्य संस्कृति व पुरातत्व विभाग ने 24 फरवरी 2011 को खनन शुरू किया। इसमें कल्चुरी युग व उसके बाद के 19 प्रस्तर मंदिरों के अवशेष व मूर्तियां मिली हैं। इनकी तिथि दसवीं शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक निर्धारित की जा सकती है। जलेश्वर महादेव को मिलाकर 7 शिवमंदिर हैं। धूमेश्वर महादेव का नया मंदिर आस्था का केंद्र है। क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के लघु पाषाण उपकरण मिले हैं। तीसरी शताब्दी ईसवी का शिलालेख मिला है जो ब्राम्ही लिपि में है।

सूर्यास्त का शानदार नजारा

मदकूदीप जाए तो वहां का सनसेट आपको बेहद आकर्षित करेगा। ईनाडु इण्डिया के कैमरे से लिए गए खास स्नेप शॉट्स आपके लिये प्रस्तुत हैं। जिसमें आप मदकुदीप के कुदरती और पौराणिक सौंदर्य को महसूस कर पाएंगे।

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