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बूढ़े ऋषि को एक सुंदर कन्या के लिए होना था जवान, तब जाकर हुआ 'च्वनप्राश' का अविष्कार

महेंद्रगढ़: नारनौल शहर से महज 10 किलोमीटर दूर पश्चिम में आर्चक पर्वत है. इसे ढोसी के नाम से जाना जाता है. सात हजार साल पूर्व महर्षि च्यवन ने तपस्या के लिए ढोसी को चुना था. लम्बा समय बीतने के बावजूद ढोसी आज भी इस क्षेत्र के लोगों के लिये आस्था का केंद्र बना हुआ है.

महर्षि च्यवन का ढोसी पर्वत पर आश्रम।


कौन थे महर्षि च्यवनइतिहास के पन्ने पलटने पर हमने पाया कि आर्यो के प्राचीनतम तीन ऋषि थे. जिनमें से एक भृगु, भृगु के पुत्र दाधीच और दाधीच के पुत्र हुए च्यवन. महर्षि च्यवन का आश्रम और गुफा वर्तमान में ढोसी पहाड़ी के ऊपर मौजूद है. ढोसी पहाड़ी एक बहुत ही रमणीक स्थल है.



जड़ी बूटियों का भंडार है ढोसी पर्वतइस पर्वत पर 54 प्रकार की जड़ी बूटियां पाई जाती है। इनसे बहुत से रोगों का उपचार सम्भव है. महाभारत के अनुसार कुरु जनपद में बहने वाली वसुंधरा नदी के पास महर्षि च्यवन का आश्रम था. यही ढोसी कहलाता है. ढोसी पहाड़ी पर पहुंचने के लिए एक रास्ता सिंघाना रोड पर स्थित थाना ओर दूसरा रास्ता कुलताजपुर गांव से होकर जाता है.
महर्षि च्यवन की एक कहानी ये भीपहाड़ी पर स्थित मंदिर के पुजारी नरसिंह बाबा ने हमसे बातचीत के दौरान बताया कि महर्षि च्यवन के समय इस क्षेत्र पर शर्याति राजा का राज था. एक दिन राजा की पुत्री सुकन्या इस पर्वत पर अपनी सहेलियों के साथ आई और घूमते घूमते उन्हें एक बाम्बी में दो ज्योत जलती हुई प्रतीत हुई, जो दरसल महर्षि की आंखे थी. अनजान राजकुमारी ने उन आंखों में कांटा चुभो दिया। आंखों से खून बहने लगा. यह सब देखकर राजकुमारी डर के वापस महल चली गई, लेकिन महर्षि च्यवन के प्रताप से राजा और उसकी प्रजा का मलमूत्र रुक गया.


इन सब से परेशान होकर राजकुमारी ने सारी बात राजा को बताई. ये सब सुनकर राजा बहुत दुखी हुए और अपनी सेना को लेकर महर्षि च्यवन के साधना स्थल पर पहुंचकर उनसे क्षमायाचना की. राजा पर तरस खाते हुए महर्षि च्यवन ने अपना श्राप वापस ले लिया. इस पर अंधे हो चुके महर्षि की सेवा करने के लिये राजा ने अपनी पुत्री सुकन्या को वहीं पर छोड़ दिया.
महर्षि ने सुकन्या से विवाह रचा लियादेवो के वैध अश्विनी और कुमार एक दिन आश्रम के पास से गुजरे तो सुंदर कन्या को वहां देखकर उन्होंने अपना वाहन रोक लिया. कन्या से बात करने पर सारा माजरा उन्हें समझ आ गया. कन्या की बात सुनने के बाद अश्विनी और कुमार च्यवन ऋषि से मिले और उन्हें युवावस्था धारण करने को कहा.


उनका आग्रह स्वीकार कर महर्षि च्यवन ने ढोसी पहाड़ी पर मौजूद जड़ी बूटियों से दवा तैयार कर उनका सेवन किया और युवावस्था में आ गए. इस मौके पर राजा शर्याति ने यहां एक बड़ा हवन यज्ञ करवाया, जिसके बाद च्यवन ने उस कन्या से विवाह किया.
च्यवन ऋषि का नाम बना ब्रांड नामआपको पता है आजकल शरीर मे स्फूर्ति, ताजगी और जवानी लाने के लिये जो च्यवनप्राश खाया जाता है, उस उत्पाद का नाम ढोसी के च्यवन ऋषि के नाम पर रखा गया.
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