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लोकसभा की जंग: करनाल में बाहरी उम्मीदवार रहा है जनता की पहली पसंद, पढ़िए क्या कहते हैं 2019 के समीकरण

करनाल: इस लोकसभा सीट के अंदर दो जिले आते हैं. एक करनाल और दूसरा पानीपत. करनाल में 5 विधानसभा सीट हैं. इसमें नीलोखेड़ी, घरौंडा, इंद्री, असंध और करनाल शामिल हैं. बात की जाए वोटर की तो जिले में करीब 10 लाख 43 हजार 522 वोटर हैं.

डिजाइन फोटो.


यहां के इतिहास राजा कर्ण से जुड़ा हुआ है. कर्ण की नगरी के नाम से करनाल को जाना जाता है. करनाल की स्‍थापना महाभारत काल में दानवीर कर्ण ने की थी. करनाल में अनेक बड़ी फैक्ट्रियां हैं. जिसमें वनस्पति तेल, इत्र और शराब बड़े पैमाने पर तैयार की जाती है. यहां कंबल और जूते के कारोबार बड़े पैमाने पर लगे हुए हैं.
पर्यटक के नजरिये से कलंदर शाह गुम्बद, छावनी चर्च और सीता माई मंदिर खास है. इतिहास के पन्नों में झांके तो करनाल में ही नादिरशाह ने मुगल बादशाह मुहम्मद शाह को हराया था. 1805 में इस शहर पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया था. ये शहर महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान का भी गढ़ रहा है, आज भी तरावड़ी शहर में चौहान का किला मौजूद है.
करनाल कृषि क्षेत्र भी है इनमें ज्यादातर 62.39% लोग ग्रामीण इलाकों से आते हैं, जबकि 20.12 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं. स्‍मार्ट सिटी में भी करनाल का नाम शामिल है. सफाई के लिए करनाल को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.
करनाल का चुनावी इतिहासलोकसभा चुनाव के इतिहास की और देखें तो कांग्रेस पार्टी के चिरंजीवी लाल शर्मा यहां सबसे लंबे समय तक सांसद रहे हैं. उनका कार्यकाल 1980 में शुरू हुआ और 1996 में बीजेपी के ईश्‍वर दयाल स्‍वामी की जीत के साथ खत्‍म हुआ. हालांकि 1998 में पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल ने ईश्‍वर दयाल से ये सीट वापस छीन ली. जिसके बाद 1999 के चुनाव में भजन लाल को मुंह की खानी पड़ी.
इसके बाद इस सीट से एक बार फिर ईश्‍वर दयाल सांसद बन गए. साल 2004 और 2009 में कांग्रेस के अरविंद कुमार शर्मा ने लगातार दो बार इस सीट से जीत दर्ज की. अरविंद शर्मा बाहरी उम्मीदवार थे. फिर भी करनाल की जनता ने उन्हें दो बार मौका दिया. साल 2014 के चुनाव में अरविन्द शर्मा ने कांग्रेस से किनारा कर लिया और बसपा पार्टी से जुड़ गए.
उन्होंने बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ा. जिसमें वो हार गए और उन्हें हराया बीजेपी के उम्मीदवार अश्वनी चोपड़ा ने, 62 वर्षीय अश्विनी कुमार पेशे से पत्रकार हैं. अश्विनी कुमार भी बाहरी उम्मीदवार हैं. इसे मोदी लहर कहें या फिर जनता का विश्वास. यहां के लोगों का जनमत एक बार फिर बाहरी उम्मीदवार को ही गया.
सांसद अश्विनी चोपड़ा का लेखा-जोखा
मई 2014 से दिसम्‍बर 2018 तक अश्विनी कुमार ने लोकसभा में कुल 379 सवाल पूछे जबकि हरियाणा राज्‍य का औसत 250 और देश का औसत 273 रहा. उन्‍होंने कोई प्राइवेट बिल तो पेश नहीं किया लेकिन 7 परिचर्चाओं में हिस्‍सा जरूर लिया. अश्विनी कुमार की संसद में उपस्थिति 56 प्रतिशत रही, जबकि राज्‍य का औसत 85 प्रतिशत है.

हरियाणा के पूर्व मुख्यंमत्री भजनलाल एक बार यहां से सांसद बने थे और एक बार हार भी गए. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री रहे आईडी स्वामी भी करनाल से दो बार जीते और दो बार हारे. जबकि बीजेपी की बड़ी नेता सुषमा स्वराज ने यहां से दो बार किस्मत आजमाई लेकिन दोनों बार उन्हें हार मिली.
पिछले चुनाव में करनाल लोकसभा सीट पर 1,684,321 लोगों का नाम मतदाता सूची में था, जिनमें 913,321 पुरुष और 771,000 महिलाओं के नाम थे. इनमें से कुल 1,193,500 लोगों ने वोट किया. यानी कुल 71 फीसदी वोट पड़े. वोट शेयर की बात करें तो कांग्रेस का वोट शेयर मात्र 19.6 प्रतिशत था जबकि भाजपा का वोटशेयर लगभग 50 प्रतिशत था. वहीं आईएनएलडी का वोट शेयर 15.7 प्रतिशत था.
किसका दबदबा ज्यादा? लोकसभा चुनाव में करनाल के इतिहास की बात करे तो करनाल की सीट सुरक्षित मानी जाती है. इसलिए अलग-अलग पार्टियां सबसे खास और मजबूत उम्मीदवार को करनाल से चुनाव लड़ाती है. क्योंकि हरियाणा के जाट लैंड में करनाल एक ऐसी सीट है जिसे जाट लैंड नहीं कहा जाता. यहां जाट वोटर कम और पंजाबी समुदाय ज्यादा है.

करनाल लोकसभा सीट को गठन के बाद से ही बड़े उलटफेर के लिए जाना जाता है. कुल मिलाकर वोट उसी ओर खिसकेगा, जो जनता का विश्‍वास जीतेगी और कड़ा मुकाबला यहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही रहता है. साल 2014 विधानसभा चुनाव में करनाल से बीजेपी प्रत्याशी मनोहर लाल खट्टर ने जीत हासिल की थी. जिसके बाद उन्हें हाई कमान ने मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था.
पिछले चुनाव में किसे कितने वोट मिले? साल 2014 में करनाल से बीजेपी के अश्विनी कुमार ने शानदार तरीके से जीत हासिल की थी. अश्विनी कुमार ने यहां से दो बार लगातार कांग्रेस से सांसद रहे अरविंद कुमार को 3,60,147 वोटों से हराया था. बीजेपी उम्मीदवार अश्विनी कुमार को कुल 5,94,817 वोट मिले थे. जबकि अरविंद कुमार को 2,34,670 वोट पड़े थे. इससे पहले साल 2004 और 2009 में यहां से कांग्रेस के अरविंद कुमार शर्मा ने जीत हासिल की थी.

इस बार भी ये सीट हॉट सीटों में से एक बनी हुई है. खबरें हैं कि यहां से केंद्रीय मंत्री मनेका गांधी इस बार चुनाव लड़ सकती हैं. वैसे भी इतिहास गवाह है कि यहां की जनता ने बाहरी उम्मीदवार पर ही विश्वास जताया है. चाहे बात पूर्व सीएम भजनलाल की हो, दो बार कांग्रेस से सांसद रहे अरविंद शर्मा की हो, वर्तमान सांसद अश्विनी चोपड़ा की हो या फिर विधानसभा में बात मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की हो. करनाल की जनता ने बाहरी उम्मीदवारों को ही जनमत दिया है.
वैसे ताल तो इस सीट से पूंडरी से आजाद विधयाक दिनेश कौशिक भी ठोक रहे हैं. हाल ही में उन्होंने करनाल में दावा किया था कि बीजेपी उन्हें करनाल लोकसभा सीट से टिकट देगी. लेकिन अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.
वहीं कांग्रेस की बात की जाए तो उनका कहना है कि हाई कमान जिसे भी टीकट देगा वो सभी को मजूर होगा. कयास है कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की पत्नी अवंतिका तंवर को यहां से लोकसभा चुनाव लड़वाया जा सकता है. कयास ये भी है कि जींद उपचुनाव की तर्ज पर कांग्रेस यहां किसी बड़े चेहरे को भी उतार सकती है.
इन दिग्गजों पर भी नजर
कांग्रेस की तरफ से वीरेंदर मराठा टिकट के बडे़ दावेदार माने जा रहे हैं. उनका नाम बीजेपी, बसपा और अब कांग्रेस से जुड़ा है. रानजनीति का इन्हें सालों से तजुर्बा है. बीजेपी, बसपा और अब कांग्रेस के साथ इनकी नजदीकियां बनी हुई है. लेकिन इन्हें टिकट मिलेगी ये अभी कहा नहीं जा सकता. वहीं दो बार से सांसद रहे अरविंद शर्मा के बारे में कुछ साफ नहीं है कि वो कौन सी पार्टी से लडे़ंगे. या नहीं लड़ेंगे. क्योंकि साल 2004 के चुनाव में इन्होंने बसपा पर विश्वास जताया थआ.
बात इनेलो और नई बनी पार्टी जेजीपी करे तो इनका कोई बड़ा चेहरा करनाल से नहीं है. साल 2019 लोकसभा चुनाव में कौन इनके उम्मीदवार होंगे ये सवाल भविष्य के गर्भ में है. पिछले चुनाव में इनेलो ने जसविंदर संधू को मैदान में उतारा था. जिनका अब देहांत हो चुका है.
बात करें सांसद के गोद लिए गांव की. पानीपत का शिवाह गांव की हालत बद बदतर है. नेशनल हाईवे-वन के साथ लगते इस गांव में गंदगी के अंबार लगे हैं. ना यहां सीवरेज के पानी की व्यवस्था है और ना ही बिजली और पीने के पानी की. ग्रामीणों का कहना है कि गांव को गोद लेने के बाद सांसद ने आज तक अपना चेहरा नहीं दिखाया.
पानीपत के गांव शिवाह को लगभग ढाई साल पहले करनाल लोकसभा सांसद अश्विनी चोपड़ा ने गोद लिया था. गोद लेने के बाद विकास कार्य तो हुए पर मूलभूत सुविधाएं पानी, सीवरेज और सफाई की व्यवस्था को दुरुस्त नहीं हो पाई. सांसद अश्वनी चोपड़ा गांव को गोद लेने के बाद गांव में एक बार भी नहीं गए. यहां तक की पानीपत के लोगों ने सांसद अश्विनी चोपड़ा के सड़कों पर गुमशुदा के बैनर भी लगा दिए थे.


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