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अमरनाथ यात्रा विशेष: इसी गुफा में बाबा भोले ने पार्वती जी को बताया था अपना राज

अमरनाथ, भगवान भोले के दर्शन जहां होते हैं। इस गुफा में बनता प्राकृतिक शिवलिंग दैवीय शक्ति होने का एहसास दिलाता है और मन में श्रद्धा भाव अनायास ही उठने लग जाता है। अमरनाथ यात्रा का जितना पौराणिक महत्व है, उतना ही ऐतिहासिक महत्व भी है। पुराण अनुसार, काशी में शिवलिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं।


मुस्लिम गड़रिए ने बताया था अमरनाथ गुफा का पता-


ऐसा माना जाता है कि मध्यकाल के बाद लोगों ने इस गुफा को भुला दिया था। 15वीं शताब्दी में एक बार फिर एक गडरिये, बुट्टा मलिक ने इसका पता लगाया। कहा जाता है कि एक महात्मा ने बुट्टा मलिक को कोयले से भरा हुआ एक थैला दिया। घर पहुंचने पर जब उसने उस थैले को सोने से सिक्कों से भरा हुआ पाया, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। खुशी के मारे वह महात्मा का धन्यवाद करना चाहता था, लेकिन वह महात्मा उसे कहीं नहीं मिला। इसकी बजाय उसने पवित्र गुफा देखी और उसमें उसे शिवलिंग के दर्शन हुए। उसने ग्रामवासियों को इसके बारे में जानकारी दी। तब से यह तीर्थ यात्रा का पवित्र स्थल बन गया, इसलिए आज भी चौथाई चढ़ावा मुसलमान गड़रिए के वंशजों को मिलता है।

अमरनाथ की ओर जाते हुए हिमालय की पहाड़ियां बेहद खूबसूरत लगती हैं

कहां है अमरनाथ की पवित्र गुफा-

अमरनाथ गुफा दक्षिण कश्मीर के हिमालयवर्ती क्षेत्र में है। यह श्रीनगर से लगभग 141 किलोमीटर की दूरी पर 3,888 मीटर (12,756 फुट) की उंचाई पर स्थित है। इस तीर्थ स्थल पर पहलगाम और बालटाल मार्गों से पहुंचा जा सकता है। इस यात्रा के लिए काफी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है क्योंकि यह यात्रा बहुत ज्यादा कठिन है और दुर्लभ रास्तों से होकर गुजरती है। यात्रा के दौरान राज्य के बड़ी संख्या में कर्मचारियों को काम पर लगाया जाता है, ताकि इस धार्मिक यात्रा के लिए नागरिक और चिकित्सा सुविधाओं के पर्याप्त प्रबंध सुनिश्चित किए जा सकें।

अमरनाथ यात्रा पर जाते हुए श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक होता है

इसी गुफा में सुनाई थी शिव जी ने पार्वती जी को अमरत्व की कथा-

सती जी ने दूसरा जन्म लेकर पार्वती जी का रूप लिया था। बार-बार जन्म लेने की वजह उन्होंने भोलेनाथ से बोला ‘मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है, परंतु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। मैं भी अजर-अमर होना चाहती हूं?' भगवान शंकर ने कहा, ‘यह सब अमरकथा के कारण है।’ यह सुनकर पार्वतीजी ने शिवजी से कथा सुनाने का आग्रह किया। बहुत वर्षों तक भगवान शंकर ने इसे टालने का प्रयास किया, लेकिन जब पार्वती की जिज्ञासा बढ़ गई तब उन्हें लगा कि अब कथा सुना देना चाहिए। अब सवाल यह था कि अमरकथा सुनाते वक्त कोई अन्य जीव इस कथा को न सुने इसीलिए भगवान शंकर 5 तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और अमरनाथ गुफा में भगवती पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने लगे।

अमरनाथ गुफा की ओर जाते हुए वे सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। तत्पश्चात चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटा (केशों) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंचकर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेशजी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंचकर शिवजी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सबकुछ छोड़कर अंत में भगवान शिव ने इस अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया और पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने लगे।

अमरनाथ यात्रा जाते हुए खूबसूरत नजारों की भी कमी नहीं

शुकदेव जी ने भी सुन ली थी कथा -

जब भगवान शंकर इस अमृतज्ञान को भगवती पार्वती को सुना रहे थे तो वहां एक शुक (हरी कंठी वाला तोता) का बच्चा भी यह ज्ञान सुन रहा था। पार्वती कथा सुनने के बीच-बीच में हुंकारा भरती थी। पार्वतीजी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गई और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारंभ कर दिया।

जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब वे शुक को मारने के लिए दौड़े और उसके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागता रहा। भागते-भागते वह व्यासजी के आश्रम में आया और सूक्ष्म रूप बनाकर उनकी पत्नी वटिका के मुख में घुस गया। वह उनके गर्भ में रह गया। ऐसा कहा जाता है कि ये 12 वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाए।

गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। जन्मते ही श्रीकृष्ण और अपने माता-पिता को प्रणाम करके इन्होंने तपस्या के लिए जंगल की राह ली। यही जगत में शुकदेव मुनि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

अमरनाथ गुफा की ओर जाता श्रद्धालुओं का जत्था

पवित्र युगल कबूतर ने भी सुनी थी यह कथा-

कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती मां की ओर गया जो सो रही थी। शिव जी ने सोचा कि अगर पार्वती सो रही है, तब इसे सुन कौन रहा था। तब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी। महादेव शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए। इस पर कबूतरों ने शिव जी से कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है, यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आर्शीवाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप में निवास करोगे।

पवित्र गुफा की तरफ जाते श्रद्धालु
अमरनाथ यात्रा के पड़ाव-

पहला पड़ाव-
बालताल से श्रद्धालु पहलगाम पड़ाव जाते हैं जिसे इस यात्रा का पहला पड़ाव माना जाता है।

दूसरा पड़ाव- पहलगाम से चंदनबाड़ी तक पहुंचना इस यात्रा का दूसरा पड़ाव है।

तीसरा पड़ाव- चंदबाड़ी से निकल कर शेषनाग पहुंचना तीसरा और सबसे कठिन पड़ाव माना जाता है।

चौथा पड़ाव-
शेषनाग से पंचतरणी हिमानी बाबा के और करीब ले आता है जिसे चौथा पड़ाव माना जाता है।

पांचवा पड़ाव- पंचतरणी से अमरनाथ की गुफा तक पहुंचना पांचवा और अंतिम पड़ाव माना जाता है। यहां आकर लोगों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

कैंप में ठहरे हुए श्रद्धालु
कैसे की जाती है यात्रा-

पहलगाम
श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। यह वैसे भी देश का मशहूर पर्यटन स्थल है। यहां का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लिद्दर और आरू नदियां इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। पहलगाम का यात्री बेस केंप छह किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है। पहली रात भक्त यहीं बिताते हैं।

चंदनबाड़ी
दूसरे दिन पहलगाम से 16 किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का पुल है। मिनी बसें पहलगाम से चंदनबाड़ी तक जाती हैं। इस रास्ते पर जाते हुए आप लिद्दर नदी देखेंगे साथ ही देखेंगे आप खूबसूरत नजारे। रास्ते में आपको बहुत से लंगर मिलेंगे जहां यात्रियों को भोजन खिलाया जाता है। इसी रास्ते पर आगे चलकर आती है पिस्सू घाटी।

पिस्सू घाटी
चंदनबाड़ी के बाद पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई, जिसमें राक्षसों की हार हुई। यात्रा में पिस्सू घाटी जोख़िम भरा स्थल है। यह समुद्रतल से 11120 फीट ऊंचाई पर है।

शेषनाग
पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में पड़ता है। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे की यात्रा बहुत कठिन होती है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक है। यात्री शेषनाग पहुंचने पर भयानक ठंड का सामना करता है। यहां पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इसमें झांकने पर भ्रम होता है कि आसमान झील में उतर आया है। झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। कहा जाता है कि शेषनाग झील में शेषनाग का वास है। 24 घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होता है। तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

पंचतरणी
शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई क्रमश: 13500 फ़ीट व 14500 फ़ीट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहने के कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यह जगह चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं।

बाबा अमरनाथ की गुफा

पवित्र अमरनाथ की गुफा यहां से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती है। रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नजदीक पहुंचकर लोग रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा-अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग वापस पहुंच जाते हैं। रास्ता काफी कठिन है, लेकिन पवित्र गुफा में पहुंचते ही सफर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

यात्रा के दौरान भोजन करते श्रद्धालु
अमरनाथ धाम का महात्म्य-

कहते हैं कि जिस पर भोले बाबा की कृपा होती है, वही अमरनाथ धाम पहुंचता है। अमरनाथ यात्रा पर पहुंचना ही सबसे बड़ा पुण्य है। जो भक्त बाबा हिमानी का दर्शन करता है, उसे इस संसार में हर तरह के सुख की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इससे व्यक्ति के कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और शरीर त्याग करने के बाद वह उत्तम लोक में जगह पाता है।

समय के साथ कम नहीं हुआ बाबा अमरनाथ के प्रति भक्तों का प्रेम-

आतंकवाद और धमकियों के बावजूद शेष भारत से लोगों, का जम्‍मू कश्‍मीर आना-जाना कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। वजह रहे वैष्‍णोदेवी, अमरनाथ, शिवखोड़ी, खीर भवानी और बुड्ढा अमरनाथ जैसे धार्मिक स्‍थल। पहले वैष्‍णोदेवी की चढ़ाई लो‍कप्रिय हुई, फिर अमरनाथ यात्रा। देश भर से अमरनाथ गुफा जाने वालो की संख्या लगातार बढ़ ही रही है। श्रद्धालुओं को हतोत्साहित करने के लिए कभी लिंग के पिघलने तो कभी कृत्रि‍म लिंग लगाने का विवाद खड़ा किया गया, परंतु श्रद्धा कम नहीं हुई।लोगों की बढ़ती भीड़ को देखकर सन् 2000 में श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की भी स्‍थापना की गई।

अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए आपको यह करना होगा-

प्रतिवर्ष अमरनाथ यात्रा के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यात्रा से पूर्व श्रद्धालुओं को पंजीकरण करवाना होता है। पंजीकरण के लिए भक्तों से कुछ शुल्क जमा करना पड़ता है। सभी श्रद्धालु जम्मू में एकत्रित होते हैं। जम्मू से यात्रियों को एक समूह में अमरनाथ यात्रा पर रवाना किया जाता है। रास्ते में इनकी सुविधाओं का विशेष ख्याल भी रखा जाता है। सरकार एवं कुछ निजी संस्थाओं द्वारा यात्रियों को यात्रा सुविधाएं दी जाती हैं।

कैसे पहुंचें-


हवाई मार्ग- श्रीनगर अमरनाथ गुफा से सबसे निकटतम एयरपोर्ट है। यहां पर आपको डल झील, नागिन झील, शंकराचार्य मंदिर और मुगल गार्डन देखने को मिलेंगे जिन्हें पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाता है।

रेलमार्ग- अगर आप रेल द्वारा सफर कर रहे हैं तो जम्मू यहां से निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां उतर कर आप रघुनाथ मंदिर, महादेव मंदिर और भी कई मंदिर घूम सकते हैं।

सड़कमार्ग- जम्‍मू और श्रीनगर सड़क मार्ग से जुड़े हुए हैं। यहां बस और टैक्‍सी सेवा आसानी से उपलब्‍ध है।
अमरनाथ जाने के दो मार्ग- अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए दो रास्ते हैं, एक पहलगाम होकर तथा दूसरा बालटाल होकर।


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