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'पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है'...गालिब की कहानी शायरी की ज़ुबानी

लखनऊ। 'हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल को खुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख्याल अच्छा है', आप भले ही उर्दू शायरी के मुरीद न हों पर यह कहना ज़रा मुश्किल होगा कि आपने ग़ालिब का नाम ही न सुना हो। ग़ालिब और शायरी के इश्क के चर्चे हर ज़माने के दिल की गलियों में आम हैं। एहसासों को लफ्जों में उतार उनको नायाब कर देना कोई गालिब से सीखे और फिर भी अगर आप पूछें की ग़ालिब कौन है तो शायद जवाब यही होगा कि 'कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या'...

डिजाइन फोटो।


आज मिर्ज़ा ग़ालिब की यौम-ए-वफात है, आज ही के दिन गालिब ने इस दुनिया को शायरी के बेशकीमती तोहफों से नवाज अलविदा कह दिया था। मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ 'ग़ालिब' का जन्म 27 दिसंबर 1796 को आगरा में हुआ था। मिर्जा गालिब उर्दू और फारसी के अज़ीम शायर थे। ग़ालिब के लिखे पत्र जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, उन्हें उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब भी मिला है।


13 वर्ष की आयु में उनका निकाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे, जहां उनकी तमाम उम्र बीती। अपने पेंशन के सिलसिले में उन्हें कोलकाता कि लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी, जिसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है। आइए एक नज़र डालते हैं गालिब के कुछ मशहूर कलाम पर...
















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