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छात्र आंदोलन से निकले बिहारी नेता ही हैं बिहारियों के बदहाली का कारण

पटना: बिहार से हर साल लाखों लोग पलायन करते हैं. बड़ी संख्या में छात्र पढ़ने के लिए बड़े शहरों में जाते हैं. हर साल नौकरी और मजदूरी के लिए बिहार से बाहर जाने वालों की संख्या लाखों में होती है. रोजगार की तलाश में बिहार वासियों का दूसरे राज्यों में पलायन पर हमेशा चर्चा होती रही है. गुजरात में बिहारियों पर हुए हमले के बाद फिर से ये चर्चा शुरू हो गई है.

जानकारी देते विशेषज्ञ.


गुजरात से बड़ी संख्या में बिहार के लोगों के माइग्रेशन को लेकर एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई है. इस पर सियासत भी होने लगी है. बिहार से पिछले कई दशकों से लोग पलायन करते रहे हैं. 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और विकास के कई काम शुरू किए तब उन्होंने कहना शुरू किया कि विकास कार्यों के कारण मजदूरों का पलायन घटा है.



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बिहारियों के पलायन को लेकर कराया गया था अध्ययन
कुछ ही सालों बाद उन्होंने एक अध्ययन भी करवाया. जिसमें उनका दावा था कि पंजाब और हरियाणा में बिहार से जाने वाले मजदूरों की संख्या घटी है. लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी. मजदूरों का पलायन पंजाब, हरियाणा की जगह गुजरात और मुंबई में होने लगा.

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बिहारी छात्र सबसे ज्यादा करते हैं पलायन
बिहार से बाहर जाने वालों में छात्र छात्राओं की संख्या सबसे ज्यादा है. खासकर तकनीकी शिक्षा के लिए हर साल लाखों छात्र दूसरे राज्यों में चले जाते हैं. कहा तो यह भी जाता है कि कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली, कोलकाता सहित कई राज्यों के टेक्निकल कॉलेज बिहारी छात्रों के भरोसे ही चल रहे हैं. इस से बिहार को आर्थिक रूप से नुकसान भी होता है.


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चौपट शिक्षा व्यवस्था के कारण होता है पलायन
हर साल बिहार का हजारों करोड़ रुपये दूसरे राज्यों को चला जाता है. बिहार में दयनीय शिक्षा व्यवस्था के कारण बेहतर शिक्षा पाने के उद्देश्य से ही ये पलायन होता है. ए एन सिन्हा कॉजेल के पूर्व निदेशक डी एम दिवाकर की मानें तो इससे बिहार को आर्थिक रूप से बहुत नुकसान हो रहा है. लेकिन छात्रों का बाहर जाना भी मजबूरी है. वहीं छात्रों का भी यही कहना है कि बिहार में निम्नस्तरीय शिक्षा व्यवस्था के कारण दूसरे राज्यों में जाना उनकी मजबूर है.


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मंत्री नहीं मानते इसे सरकारी फेल्योर
एनडीए सरकार के मंत्री अभी भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि केवल बिहार से ही पलायन होता है. बीजेपी के मंत्री का कहना है कि दूसरे राज्यों से भी लोग बिहार आते हैं और पूरा देश एक है तो कोई भी कहीं जा सकता है.


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3 दशक से सत्ता पर काबिज हैं छात्र आंदोलन के नेता
बिहार में पिछले 3 दशकों से छात्र आंदोलन से निकले नेता ही सत्ता पर काबिज हैं. न केवल बिहार में बल्कि केंद्र में भी कई सालों से ऐसे मंत्री रहे हैं जो छात्र आंदोलन से निकले हैं. लेकिन दुर्भाग्य से न छात्रों का पलयान रुका है और ना हीं नौकरी के लिए जाने वाले लोगों का. सबसे ताज्जुब की बात तो ये है कि सरकार माइग्रेशन पर अध्ययन कराने से भी बचती रही है. एएन सिन्हा कॉलेज जैसे संस्थान में 35-40 साल पहले अध्ययन जरूर हुआ था. उसके बाद इस पर विस्तृत अध्ययन आज तक नहीं किया गया.


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डबल डिजिट ग्रोथ का नहीं हुआ कोई फायदा
वहीं 10 साल पहले नीतीश कुमार ने जो अध्ययन कराया था, वह राजनीतिक लाभ के मुताबिक उसका परिणाम बताया गया. दूसरे राज्यों में जाने वाले लोगों के लिए दिल्ली में एक सेंटर भी बनना था, जो दूसरे राज्यों में जाने वाले लोगों के साथ कोऑर्डिनेशन स्थापित करता. लेकिन वह केंद्र भी दिल्ली में स्थापित नहीं हुआ. पूरे देश में बिहारियों के खिलाफ मारपीट की घटनाएं जिस तरह से लगातार हो रही हैं, इसके बाद भी सरकार की पहल पलायन रोकने को लेकर कहीं होती नहीं दिख रही है. माइग्रेशन की यह स्थिति तब है जब बिहार सरकार हर साल डबल डिजिट ग्रोथ का दावा करती रही है.


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