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बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों को मात दे रहा है ये सरकारी स्कूल, यहां चलती है बाल संसद

रांचीः अ से अनुशासन, प से पढ़ाई और स से सफाई. इस मूल मंत्र से राजधानी का एक सरकारी स्कूल संचालित हो रहा है. यह विभाग का आदेश नहीं बल्कि खुद का प्रयास है. हम बात कर रहे हैं राजकीयकृत मध्य विद्यालय पंडरा का. यहां के प्रधानाध्यापक ने अपने नाम के अनुसार शिक्षा का काम शुरू किया है.

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प्रधानाध्यापक का नाम अशोक प्रसाद सिंह है. प्रत्येक शब्द के पहले अक्षर के अनुसार वे काम कर रहे हैं. जैसे अ से अनुशासन, प से पढ़ाई और स से सफाई, इन्हीं तीन मूल मंत्र के ऊपर विद्यालय संचालित हो रहे हैं. यह सरकारी स्कूल निजी विद्यालयों को मात दे रहा है. यहां गतिविधि आधारित शिक्षा मिलती है. विघार्थियों के लिए- 'करो, समझो, सीखो तब बताओ' के मूल मंत्र पर शैक्षणिक कार्य होते हैं.

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बच्चों की उपस्थिति और ठहराव के लिए कई रोचक और रचनात्मक कार्य होते हैं. बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा दी जाती है. संसाधन विहीन स्कूल होने के बावजूद यहां शैक्षणिक माहौल बना है. नन्हें बच्चे अपनी तोतली आवाज में गतिविधि को साथ जब कोई कविता पढ़ते हैं तो मन भी रोमांचित हो उठता है.

कुछ नया करने की जज्बा हो तो मुश्किल नहीं होता कार्य
कहते हैं कुछ नया और अलग करने की जज्बा हो तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं होती. इसी जज्बे से राजकीयकृत मध्य विद्यालय पंडरा की सूरत और सीरत बदलने की कोशिश में शिक्षक भी जुटे हैं. इनके प्रयास से शैक्षणिक गतिविधि और माहौल ऐसी बन गई है कि आसपास के निजी स्कूल भी मात खा रहे हैं. स्कूल में स्वच्छ भारत का सपना साकार होता दिखता है. बच्चे बाल उम्र में ही संसद में बैठने का आनंद लेते हैं. स्कूल की योजनाएं भी इसी बाल संसद की स्वीकृति पर लागू होती है. अथार्त स्कूल का बाल संसद क्रियाशील है.
केजी क्लास से आठवीं तक संचालित इस स्कूल में 1100 विद्यार्थी नामांकित हैं. बच्चों के नियमित उपस्थिति 85% से ऊपर होती है. इससे शैक्षणिक माहौल बनाने में बेहतर साबित होता है. प्रधानाध्यापक अशोक प्रसाद सिंह ने बताया कि सरकारी होने के बावजूद आसपास के कई ऐसे बच्चे हैं जो संपन्न परिवार से आते हैं. इस स्कूल में शैक्षणिक माहौल बनने से आसपास के निजी स्कूलों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. स्कूल भले ही संसाधन विहीन हो, लेकिन बच्चों से बातचीत से शैक्षणिक माहौल की झलक व गहराई का पता चल जाता है. प्रतिदिन के प्रार्थना सभा में मन की बात, ऑल राउंड एटीट्यूड के लिए प्रतिदिन बेस्ट स्टूडेंट ऑफ डे का पुरस्कार दिया जाना इसे और खास बनाती है.
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स्कूल मिस नहीं करना चाहते बच्चे
बच्चे एक दिन भी स्कूल मिस नहीं करना चाहते. स्कूल के प्रति उनका मन एक्साइटेड रहता है. छुट्टी के दिनों में भी बच्चे आने को तैयार रहते हैं. कुछ दिन पूर्व छुट्टी में भी आठवीं के विघार्थियों के लिए कक्षाएं संचालित भी हुई थी. बच्चों में प्रतिदिन स्कूल पहुंचने के लिए रुचि जागृत करने के उद्देश्य से स्कूल में शिक्षक और विद्यार्थी का जन्मदिन भी सेलिब्रेट किया जाता है. स्कूल का अपना एकेडमिक प्लान बना है. बाल संसद क्रियाशील है, तो क्लास लेने में देर करने पर शिक्षकों से स्पष्टीकरण भी ली जाती है. स्कूल में बच्चों का सतत एवं समग्र मूल्यांकन का पूरा प्रबंध है.
स्कूल का है अपना एकेडमिक प्लान
राजकीयकृत मध्य विद्यालय पंडरा का अपना एकेडमिक प्लान है. इसमें साल भर तक की गतिविधियों की जानकारी अंकित है. इसमें प्रार्थना सभा से लेकर कक्षा संचालित करने की पूरी रूटीन है. नामांकन के बाद स्टूडेंट का डाटा बेस तैयार मिलता है. जिसमें बच्चों से संबंधित 32 तरह की सूचनाएं होती है. सभी बच्चों का डेटाबेस परिचय पत्र बना है. यह परिचय पत्र उनके घरों में होती है. लेकिन बाल संसद और हाउस के बच्चों को आई कार्ड निर्गत किया गया है. विद्यालय में पांच हाउस बने हैं, जिसका नाम भारत रत्नों के नाम पर है. इससे बच्चों का सामान्य ज्ञान भी मजबूत होता है. इन बच्चों की पहचान दूर से ही हो जाती है. क्योंकि इनका ड्रेस कोड अलग-अलग होती है.

विद्यालय में जो गतिविधियां या प्रतियोगिताएं होती है, उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाता है. सतत एवं समग्र मूल्यांकन बच्चों का होता है. पाठ्यक्रम के अलावा मोरल साइंस, सामान्य ज्ञान, आर्ट एवं क्राफ्ट, म्यूजिक और सफाई पर यहां मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है. गतिविधियों के लिए वार्षिक कैलेंडर है. इसके आधार पर गतिविधियां होती है. सक्षम हैं हम, क्विज प्रतियोगिता यहां का खास होता है. प्रत्येक क्लास का लर्निंग आउटकम तय किया गया है. इसके अलावा प्रोजेक्ट वर्क सर्वे, नामांकन अभियान, शिक्षक और बच्चों का जन्मदिन आदि मनाया जाता है, ताकि स्कूल के प्रति उनका लगाव बड़े और एक उत्साह के साथ शैक्षणिक माहौल बन सके.

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संसाधन के मामले में पीछे है यह स्कूल
राजकीयकृत मध्य विद्यालय पंडरा वर्ष 1954 से स्थापित है. स्कूल में 1100 बच्चे नामांकित हैं. इसमें 75% बालिकाएं हैं. इसके बावजूद क्रियाशील शौचालय का अभाव दिखता है. पूरे देश में स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय बनाए गए, लेकिन स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शौचालय आज तक नहीं बन सका. इतना ही नहीं स्कूल की बाहरी चारदीवारी भी जिर्ण-शीर्ण अवस्था में है. इस कारण विद्यालय की अंदरूनी विकास भी समुचित रूप से नहीं हो पाती. स्कूल अवधि में तो यहां छात्र-छात्राओं की चहल-पहल रहती है. लेकिन छुट्टी के बाद स्कूल परिसर अराजक तत्वों का अड्डा बन जाता है. मिड डे मील की पाठशाला इतना छोटा है कि ग्यारह सौ बच्चों का मिड डे मील बनाना रसोइयों के लिए परेशानी भरा होता है.
प्रधानाध्यापक और शिक्षकों के प्रयास से शिक्षक अभिभावक बैठक में यह बातें उठती भी है, लेकिन समस्या का निदान नहीं हो पाता. स्कूल के प्रधानाध्यापक ने चारदीवारी और शौचालय को लेकर कई बार विभाग के साथ पत्राचार कर चुके हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी है. स्कूल की इस मामूली और मूल आवश्यकताएं को पूर्ण कर दी जाए तो स्कूल और बेहतर हो जाएगा.


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