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मकर संक्रांति के दिन आदिवासी महिलाएं बनाती हैं ये 'खास' व्यंजन

जमशेदपुरः 14 जनवरी यानि मकर संक्रांति का पर्व, ये पर्व है नए दौर के शुरूआत का. ये पर्व है हर्ष के साथ नई चीजों के समावेश और नई जीवनशैली में ढलने का, और जब आदिवासी समुदाय की तैयारियों की बात हो तो ये कुछ खास हो जाती है. झारखंड और खासकर जमशेदपुर के आदिवासी आज भी अपनी परंपरा को मजबूती से पकड़े हुए हैं, और इसी का स्वाद मकर संक्रांति लेकर आता है.


इस दिन ग्रामीण महिलाएं एक खास तरह का व्यंजन बनाती हैं, जिसे पीठा कहा जाता है. वैसे तो पीठा कई तरह के बनते हैं, लेकिन गुड़ का पीठा, चीनी का पीठा और लठ्ठों का पीठा इस दिन खास तौर पर बनाए जाते हैं. मान्यता है की पीठा की मिठास से ही समाज परिवार में मिठास बरकरार रहता है.
ग्रामीण ईश्वर सोरेन बताते हैं कि 14 जनवरी के पूर्व 13 जनवरी को बाउंडी कहा जाता है और इस रात को परिवार समाज के लोग पत्ते में मछली खा कर जूठे पत्ते को घर के आंगन के एक कोने में सजाकर रख देते हैं. ऐसा माना जाता है कि इससे न केवल घर में बरकत होती है, बल्कि भगवान का आशीर्वाद भी बना रहता है. साथ ही इस दिन पैर के तलुएं में तेल लगाकर अगले दिन 14 जनवरी की सुबह नदी या तालाब में नहाने की प्रथा है. आदिवासी समाज की आज की पीढ़ी भी इन सारी परंपराओं को काफी उत्साह से मनाती हैं.



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