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डर: अगर भारतीयों ने नहीं बदली ये आदत तो होगी 36 लाख लोगों की मौत...

नई दिल्ली। गरीब ग्रामीण भारत में खाना पकाने के लिए गोबर या लकड़ी का हमेशा से प्रयोग होता रहा है। लेकिन एक ताजा रिसर्च से पता चला है कि भारतीयों का ये तरीका लाखों मौत का कारण बन रहा है।

चूल्हे पर खाना बनाने का दृश्य।


दरअसल, घरों में इस्तेमाल होने वाले जैव ईंधन का उत्सर्जन भारत में वायु प्रदूषण का सबसे घातक स्रोत साबित हो रहा है और यह संख्या वायु प्रदूषण के मुख्य कारक तत्व पीएम 2.5 की वजह से होने वाली बीमारियों से हुई मौतों का एक चौथाई है।


वायु प्रदूषण से 2015 में 2.67 लाख मौतें
अमेरिका के बोस्टन स्थित स्वास्थ्य प्रभाव संस्थान की बीमारियों के प्रभाव पर आधारित ‘जीबीडी मैप्स’ रिपोर्ट के अनुसार भारत के ग्रामीण इलाकों में भोजन बनाने के लिए स्वच्छ ईंधन के अभाव में गोबर, लकड़ी और कोयले के इस्तेमाल को वायु प्रदूषण का बड़ा स्रोत बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार आवासीय क्षेत्रों में जैव ईंधन के जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण से जनित बीमारियों से साल 2015 में 2.67 लाख मौतें हुईं। यह संख्या पीएम 2.5 की वजह से होने वाली कुल 11 लाख मौतों का लगभग एक चौथाई है। जारी की गयी जीबीडी रिपोर्ट वायु प्रदूषण के सबसे घातक कारक तत्व पीएम 2.5 के प्रभाव और इसके स्रोत पर आधारित है। इसमें आवासीय क्षेत्रों में जैव ईंधन के जलाने, औद्योगिक इकाइयों और तापीय बिजलीघरों में कोयले के इस्तेमाल, पराली जलाने और वाहन जनित प्रदूषण के प्रभाव का अध्ययन किया गया है।

पराली जलाने से 66200 मौतों का दावा
रिपोर्ट के अनुसार भारत में कोयले का इस्तेमाल मुख्य रूप से औद्योगिक इकाइयों और ताप बिजली घरों में होता है। इनमें कोयला जनित उत्सर्जन से साल 2015 में 169300 मौतें हुईं। वहीं पराली जलाने के कारण हुए वायु प्रदूषण की वजह से 66200 लोगों की मौतों का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वाहन जनित प्रदूषण के कारण 23100 और ईंट भट्टा के कारण 24100 मौतें हुईं। रिपोर्ट में वायु प्रदूषण के मुख्य कारक के रूप में पीएम 2.5 के बढ़ते स्तर को देखते हुए भविष्य में इसके कारण होने वाली बीमारियों से मौत का आंकड़ा भी बढ़ने की आशंका जताई गयी है।

2050 तक 36 लाख मौत
इसमें कहा गया है कि हवा में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ाने वाले उत्सर्जन को रोकने के उपाय भारत में यदि नहीं किये गये तो साल 2030 तक इसकी वजह से होने वाली मौतों की संख्या 17 लाख और साल 2050 तक 36 लाख हो जाएगी।

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