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20रु में 5 किलो आता है देहात का ईंधन! पकती हैं करारी रोटियां-जमती है हुक्के की महफिल

नई दिल्ली। दिल्ली जैसे शहर में लोग भले ही मॉडर्न बन गए हो और ऊंचे-ऊंचे मकान में रहते हो। लेकिन फिर भी इसी दिल्ली में इसके बीच एक पुरानी परंपरा आज भी जिंदा है। आज भी लोग पुराने उस ईंधन का इस्तेमाल कर रहे हैं जो देहात के कुछ परिवारों के लिए रोजगार का एकमात्र जरिया है।

देखें वीडियो।


दिल्ली जैसे अत्याधुनिक शहर में ओर भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास चूल्हे की रोटी खाने और उपलों को सुलगाकर हुक्का पीने के लिए इतना समय न हो। लेकिन दिल्ली देहात के लोगों के पास दोनों चीजों के लिए समय है।


जिंदा है अभी भी चूल्हे का खाना
बाहरी दिल्ली के सुल्तानपुर गांव के पास सुल्तानपुरी झुग्गी इलाका है, जहां पर गाय-भैंस के गोबर से बने उपलों को लाकर बेचा जाता है। उपलों की इस टाल की मालकिन रेणु ने बताया कि हम लोग इन उपलों को पास के गांवों से लाते है और 20 रुपये के धड़ी (यानि 20 रुपये) में पांच किलो के हिसाब से बेचते है। जिनसे लोग अपने घरों में रोटी बनाते है। वहीं कुछ देहात दिल्ली के लोग इसे हुक्का पीने में भी प्रयोग करते हैं। वहीं रेणु बताती है कि भरण पोषण का एक मात्र यही साधन है, जिससे वो पूरे परिवार का पेट भरती हैं।

धड़ी के हिसाब से ले जाते है उपले
वहीं दूसरी ओर उपले खरीदने आए ग्राहक रामकुमार ने बताया कि, "मैं यहां से 20 से 25 रुपये धड़ी (पांच किलो) के हिसाब से उपले लेकर जाता हूं। इन उपलों से हम लोग अपने घरों में चूल्हे की रोटी बनाने और खाना बनाने के लिए इस्तेमाल करते है।

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आज दिल्ली के ज्यादातर घरों में चूल्हे की जगह एलपीजी गैस ने ले ली है लेकिन चूल्हे में उपले से रोटी बनाने की परंपरा आज भी दिल्ली देहात में जिंदा है। जहां शहरीकरण के बाद लोग चूल्हों की जगह एलपीजी सिलेंडर का प्रयोग करने लगे है, वहीं कुछ ऐसे लोग अभी है जो चूल्हे का खाना खाना पसंद करते है। जो रेणु जैसी औरतों के लिए रोजगार का स्त्रोत बना हुआ है।

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