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EXCLUSIVE: चुनाव आयोग 'वन नेशन-वन पोल' के लिए तैयार

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा है कि राजनीतिक सहमति बने, चुनाव आयोग वन नेशन, वन इलेक्शन के लिए तैयार है. ऐसा पहले भी होता रहा है और राजनीतिक पार्टियां एक राय कायम कर लेती हैं, तो आयोग पूरी तरह से तैयार है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत से विशेष बातचीत.


ईटीवी भारत की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख नंदिनी सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत से एक्सक्लूसिव बातचीत की. उन्होंने बताया कि जो भी संशोधन की आवश्यकता है, राजनीतिक पार्टियां इसका समाधान निकाल सकती हैं.
सवालः वन नेशन वन पोल पर चुनाव आयोग की क्या राय है. क्या यह संभव है. क्या व्यावहारिक है. किस तरह की तैयारी की जरूरत पड़ेगी?
जवाबःदेखिए, जहां तक संभव होने की बात है, तो पहले भी इस तरह से चुनाव होते रहे हैं. 1952, 1957, 1962 और 1967 में ऐसा हुआ है. हां, अब इसे कराने के लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी. क्योंकि अलग-अलग विधानसभाओं के अलग-अलग कार्यकाल हैं.
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कानून में संशोधन की जरूरत
इसके लिए रिप्रेजेन्टेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट में संशोधन की जरूरत होगी. और भी संशोधन की जरूरत पड़ेगी. इसके बाद ही चुनाव आयोग चुनाव कराने की स्थिति में हो सकता है.


सवालः क्या इससे खर्च पर असर पड़ेगा?

जवाबः हां, ये तो सही है कि हमें ज्यादा मशीन की जरूरत होगी. ज्यादा चुनाव कर्मियों की जरूरत होगी. लॉजिस्टिक सपोर्ट ज्यादा चाहिए होगा. लेकिन इसे कराने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

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सवालःकितने समय में ये संभव होगा.
जवाबः देखिए, फैसला तो सरकार को लेना है. पॉलिटिकट एक्जेक्यूटिव को काम करना है. सरकार को कितना समर्थन है और राजनीतिक सहमति की बात है. ये हो जाए, तो चुनाव आयोग तैयार है.

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सवालःजम्मू-कश्मीर जैसे हालात हो जाएं, तो क्या रास्ता होगा.

जवाबः देखिए, जब संवैधानिक संशोधन होगा, तो ऐसी सारी बातों को उसमें शामिल किया जाएगा. क्या होगा, कैसी परिस्थिति होगी, इस पर लंबी बहस होगी. इसके बाद ही रास्ता निकलेगा.

विपक्षी दलों से EC के अहम सवाल
हम आपको बताते हैं कि जैसे विपक्षी पार्टियों ने नो-कंफिडेंस मोशन लाया है, तो उसे कंफिंडेंस मोशन भी साथ में लाना चाहिए. वैकल्पिक सरकार कैसे बनेगी, इसे बताना होगा. उन्हें ये बताना होगा कि लोकसभा या विधानसभा के बाकी बचे हुए कार्यकाल के दौरान सरकार कैसे बनेगी. यह सरकार शॉर्ट टर्म होगी या नहीं.

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कॉस्ट पर अभी तक कोई स्टडी नहीं अगर कार्यकाल कम समय के लिए बचा है तो तब तक के लिए सहमति से सरकार बने. उसके बाद चुनाव होगा. जहां तक कॉस्ट की बात है, तो अभी तक कोई स्टडी नहीं आयी है.

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सुरक्षा बलों की तैनाती एक साथ कुछ कुछ चीजों में खर्च घटेगा, कुछ में बढ़ेगा. जैसे मशीन की जरूरत ज्यादा होगी. ज्यादा कर्मियों की जरूरत होगी. लेकिन सुरक्षा बलों की तैनाती एक साथ हो जाएगी. यहां फायदा होगा.


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