• A
  • A
  • A
पहाड़ी शादियों की पहचान इस नृत्य में दिखता है युद्ध कौशल, बुरी आत्माओं से करता है सुरक्षा

अल्मोड़ा: देवभूमि अपनी संस्कृति, तीज, त्योहार और परम्पराओं से देश दुनिया में विशेष पहचान बनाए हुए है. कुमाऊं क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य छोलिया भी अपनी एक विशिष्ट पहचान के तौर पर जाना जाता है. नृतकों की वेशभूषा और उनके हाथों में लहराते ढाल-तलवारों को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह नृत्य एक युद्धपरक नृत्य का प्रतीक है. आज इस लोकनृत्य का प्रदर्शन विवाहों में किया जाता है.

छोलिया नृत्य करते कलाकार.


जनमान्यता है कि पुराने समय में राजाओं की बारात में सैनिक युद्धकला के अभ्यास का कलात्मक प्रदर्शन करते हुए आगे चला करते थे. जो धीरे-धीरे परम्परा का हिस्सा बन गई. छोलिया को उसी परम्परा का हिस्सा माना जाता है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि छोलिया नृत्य की शुरुआत खस राजाओं के समय हुई थी, जब विवाह तलवार की नोक पर हुआ करते थे. छोलिया नृत्य को लेकर यह भी धारणा कि यह बुरी आत्माओं से बारातियों को सुरक्षा प्रदान करता है.
छोलिया नृत्य के कलाकारों के अनुसार नर्तकों को गति देने के उद्देश्य से कई तरह की तालें होती हैं, जिन्हें अलग-अलग समय के लिए नीयत किया गया है. इस नृत्य की रफ्तार को नियंत्रित करने का मुख्य काम ढोल वादक का ही होता है. इस नृत्य टोली में 12 से 14 लोग हो सकते हैं.
पढ़ें: कुत्ते का पीछा करते हुए बाथरूम में कैद हुआ गुलदार, कड़ी मश्क्कत के बाद काबू में आया
छोलिया नृत्य की टीम चला रहे संस्कृतिकर्मी चंदन बोरा ने बताया कि यह इस नृत्य की वेशभूषा और हाथों में तलवार ढाल को देखकर लगता है कि यह परम्परा राजाओं के वक्त से चली आ रही है. राजाओं के समय में सैनिक इसी परम्परागत वेशभूषा में तलवार लहराते हुए आते थे, लेकिन इस कला के कलाकारों के सामने आज रोजी-रोटी का संकट सामने है. यह परम्परा आज आधुनिकता के दौड़ में धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. सरकारों की तरफ से इसके संवर्द्धन और संरक्षण के लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे हैं.

CLOSE COMMENT

ADD COMMENT

To read stories offline: Download Eenaduindia app.

SECTIONS:

  होम

  राज्य

  देश

  दुनिया

  कारोबार

  क्राइम

  खेल

  मनोरंजन

  इंद्रधनुष

  गैलरी

  टूरिज़्म

  MAJOR CITIES