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मकर संक्रांति: त्योहार एक, नाम अनेक

जयपुर। भारत विविधताओं होने के बाद भी यहां त्योहारों का खासा महत्व होता है। देश में पड़ने वाले लगभग सभी त्योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाए जाते हैं। सभी राज्यों में अलग-अलग नामों से जानने के बाद भी त्योहारों का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं कि कहां किस नाम से जानी जाती है मकर संक्रांति।

प्रतीकात्मक फोटो।


कहां किस नामों से जानते हैं
तमिलनाडु राज्य में ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल। गुजरात और उत्तराखण्ड में उत्तरायण। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में माघी, लोहड़ी। असम में भोगाली बिहु। जम्मू कश्मीर में शिशुर सेंक्रात। उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी। पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति और कर्नाटक में मकर संक्रमण के नाम से जाना जाता है।
अन्य देशों में किन नामों से है पहचान
बांग्लादेश में पौष संक्रांति। नेपाल में माघे संक्रांति या माघी संक्रांति या खिचड़ी संक्रांति। थाईलैण्ड में सोड़गकरन। लाओस में पि मा लाओ। म्यांमार में थिड़यान, कम्बोडिया में मोहा संगक्रान और श्री लंका में पोंगल या उझवर तिरुनल के नाम से जानी जाती है।


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भारत में मकर संक्रांति
सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रांति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है

उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। 14 जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। 14 दिसम्बर से 14 जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रांति से शुरू होकर शिवरात्रि के आखिरी स्नान तक चलता है। संक्रांति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परम्परा है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है, तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है।

बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है।
महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्राति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं।

बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहां लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है कि "सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार"।

तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं।

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असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं।

राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्य सूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।



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