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राजस्थान रो रण 2018 : कांग्रेस को मेवाड़ की इन तीन सीटों पर बेलने पड़ेंगे पापड़, याद है जोशी की हार

राजस्थान में विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपना चुनावी अभियान तेज कर दिया है. राजसमंद जिले की तीन सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस को जीतने के लिए पापड़ बेलने पड़ सकते हैं.

देखें वीडियो।


राजसमंद। राजस्थान में चुनावी रणभेरी बज चुकी है. 7 दिसंबर को प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के कार्यकर्ता जोर-शोर से मतदाताओं को लुभाने की कवायद में जुटे हैं. लेकिन कांग्रेस के लिए राजसमंद, भीम और नाथद्वारा सीट पर कब्जा जमाना आसान नहीं होगा. क्योंकि पिछले कुछ चुनावों में ये तीनों ही सीटें भाजपा के लिए मजबूत गढ़ के रूप में तब्दील होती नजर आई थीं.
कांग्रेस में आपसी खींचतान का फायदा उठा सकती है भाजपा साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी के नेता-कार्यकर्ताओं के बीच आपसी खींचतान को लेकर भाजपा को फायदा मिल सकता है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि लगातार हार के मिलने के बावजूद क्षेत्र के कांग्रेसी एक-दूसरे की टांग खिंचाई में लगे हुए हैं.
उधर भाजपा राजसमंद और भीम दोनों सीटों पर निरंतर मजबूत होती जा रही है और इसमें सेंध लगाना कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल काम दिख रहा है. चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2003 में राजसमंद सीट पर भाजपा के नए चेहरे बंशीलाल खटीक कांग्रेस के बंसीलाल गहलोत को हराकर जीत गए.

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2008 परिसीमन के बाद राजसमंद सिटी सामान्य सीट हो गई और यहां से भाजपा ने किरण माहेश्वरी को मैदान में उतारा, जो कांग्रेस के हरि सिंह राठौड़ को पटखनी देने में कामयाब रहीं. उसके बाद भी माहेश्वरी का जलवा कायम रहा और 2013 में भी वे हरि सिंह को मात देकर विधानसभा पहुंच गईं.
भीम विधानसभा की बात करें तो यहां से साल 2003 में भाजपा के हरिसिंह कांग्रेस के लक्ष्मण सिंह को पराजित कर सीट निकालने में कामयाब रहे. उसके बाद 2008 और 2013 के चुनावों में भी हरि सिंह लगातार जीत को कायम रखने में सफल रहे.
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सीपी जोशी के गढ़ में भी भाजपा का दबदबा अब यदि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सीपी जोशी के गृह नगर नाथद्वारा सीट पर जाएं तो यह सीट धीरे-धीरे भाजपा के लिए आसान होती दिख रही है. 2003 में यहां से सीपी जोशी अंतिम बार जीते थे. उस दौरान उन्होंने भाजपा के रामचंद्र बागोरा को हराया था. उसके बाद से उनके ही मित्र कल्याण सिंह लगातार 2008 और 2013 में चुनाव जीते.


2008 में तो कल्याण सिंह ने जोशी को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया था. उनका यह मुकाबला पूरे देश में चर्चा का विषय रहा था. क्योंकि कल्याण सिंह ने महज एक वोट से सीपी जोशी को हरा दिया था. जबकि उस समय जोशी कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे. लेकिन एक मत से हारने के कारण वह सीएम पद की दौड़ से बाहर हो गए. 2013 में भी भाजपा ने कल्याण सिंह पर दांव लगाया. जिन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी देवकीनंदन गुर्जर को पराजित किया. इस प्रकार लगातार भाजपा यहां से जीत के सिलसिले को कायम रखे हुए हैं.
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हालांकि इस बार होने जा रहे चुनाव में नाथद्वारा से पार्टी प्रत्याशी को लेकर भाजपा खासी उलझी हुई है. क्योंकि कल्याण सिंह का कुछ माह पूर्व निधन हो गया था. अब देखना यह है कि भाजपा जीत के सिलसिले को बनाए रखने के लिए किस पर अपना दाव लगाती है.
वहीं कुंभलगढ़ विधानसभा पर नजर डालें तो यहां 2003 में भाजपा के सुरेंद्र सिंह राठौड़ ने गणेश सिंह परमार को हराकर जीत हासिल की. 2008 में कुंभलगढ़ में कांग्रेस के गणेश सिंह परमार ने भाजपा के सुरेंद्र सिंह राठौड़ को मात देकर जीत हासिल की. वहीं 2013 के कुंभलगढ़ चुनाव में फिर से सुरेंद्र सिंह राठौड़ ने वापसी करते हुए गणेश सिंह परमार को हरा दिया.
कुल मिलाकर इस सीट को सत्ता की हवा के साथ चलने वाली सीट माना जाता है. अब यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि वर्तमान में जिले की चारों सीटें भाजपा की झोली में हैं या फिर कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत कर इन विधानसभा सीटों पर भाजपा को पटखनी दे पाएगी.

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