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वसुंधरा की जगह कौन भरेगा...ये हैं संभावित चेहरे

पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को राज्य की राजनीति से दूर करते हुए उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है. इस जिम्मेदारी के बीच ये सवाल भी खड़ा होने लगा है कि वसुंधरा के बाद उनकी जगह आखिर कौनसा सियासी धुरंधर भरेगा....

वसुंधरा राजे।


जयपुर . पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भाजपा में केंद्रीय उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने उन्हें प्रदेश की राजनीति से तो दूर करने की तैयारी कर ली है. लेकिन प्रदेश भाजपा में वह कौन सा सियासी धुरंधर है जो राज्य के बाद खाली होने वाली इस कमी को पूरा कर सकता है. भाजपा नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है. क्योंकि वसुंधरा राजे के रहते हुए प्रदेश भाजपा में उनके सियासी कद का सरकार या संगठन में कोई भी नेता नहीं पहुंच सका. प्रदेश में दूसरी पंक्ति में खड़े कुछ ऐसे ही नेताओं को आगे कर पार्टी अपनी पुरानी भूल में सुधार करेगी.
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हालांकि यह काम इतना आसान नहीं होगा. क्योंकि पार्टी के समक्ष कुछ ही माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव महत्वपूर्ण है और इन चुनाव में वसुंधरा की नाराजगी लेकर प्रदेश की सभी 25 सीटों पर भाजपा का कमल खिलाना बेहद मुश्किल है. यदि वसुंधरा की राजस्थान से सियासी सक्रियता कम की जाती है तो वह तमाम नेता दूसरी पंक्ति से निकल कर पहली पंक्ति में आ सकते हैं. जिन्हें पार्टी नेतृत्व ने् विधानसभा चुनाव के दौरान वसुंधरा के सामने खड़ा करने की कोशिश की थी. इन नेताओं में राजस्थान के कई सियासी दलों के नाम शामिल है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी नेतृत्व ने ऐसे कई नेताओं को आगे करना चाहा था जो वसुंधरा को भविष्य में चुनौती दे सकते हैं. इन नेताओं के आगे आने से पार्टी को मजबूती के साथ ही एक ऐसा नेता भी मिल सकता है जो पार्टी को वसुंधरा के बाद आगे ले जाने का काम कर सके.

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हालांकि, यह भी सच है कि जमीनी स्तर पर ऐसा मजबूत नेता के खड़ा कर पाना पार्टी के लिए इतना आसान भी नहीं है. जानकारों का कहना है कि वसुंधरा की जगह खड़े होने वाले नेता को लोकसभा चुनाव तक पूरी मजबूती के साथ खड़ा होना होगा। जो कि काफी मुश्किलभरा है। वहीं, यह भी माना जा रहा है वसुंधरा की जगह आने वाले नेता को स्थायी रूप से से पार्टी की कमान शायद ही संभालने को मिल सके। क्योंकि, लोकसभा चुनाव के बादस यदि दिल्ली कमजोर हुई तो वसुंधरा फिर पलटकर राजस्थान ही आएंगी।ये नेता आ सकते हैं आगे
गजेंद्र सिंह शेखावत
केंद्रीय मंत्री और सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम इस सूची में सबसे ऊपर है. ये वही चेहरा है जिसे अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाना चाहते थे. लेकिन शेखावत के नाम का विरोध तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ही किया था. विरोध भी ऐसा कि आलाकमान 74 दिन तक पार्टी के नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान नहीं कर पाया. आखिरी में बीच की गली निकाल कर मदन लाल सैनी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. हालांकि इसके बाद बनी विधानसभा चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक शेखावत को बनाकर पार्टी आलाकमान ने सबको चौंका दिया था. अब जब वसुंधरा राजे को केंद्रीय उपाध्यक्ष बनाकर नेता प्रतिपक्ष और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ से दूर कर दिया गया है तो फिर गजेंद्र सिंह को अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा किया जा सकता है.

गुलाबचंद कटारिया शेखावत के अलावा और भी कई नेता है जिनका सियासी कद राजे के समान भले ही ना हो लेकिन अनुभव और संघ पृष्ठभूमि के होने के चलते अग्रिम पंक्ति में आ सकते हैं. इसमें गुलाबचंद कटारिया का नाम भी शामिल है. गुलाब चंद कटारिया राजस्थान में 8 बार के विधायक है और संघ पृष्ठभूमि से भी आते हैं. लिहाजा पार्टी के अनुशासित सिपाही होने का तोहफा मिल सकता है.

राज्यवर्धन राठौड़ जयपुर ग्रामीण से सांसद और केंद्र में केंद्रीय खेल व सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का नाम भी शामिल है. हालांकि राजनीति में राज्यवर्धन बहुत पुराना चेहरा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह पसंद माने जाते हैं. साथ ही राजपूत समाज से होने के कारण भी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है.

राजेन्द्र राठौड़- राजेंद्र राठौड़ भी एक ऐसा ही नाम है जो वसुंधरा राजे की कमी को पूरा करने के लिए आगे लाया जा सकता है. संसदीय मामलात के जानकार होने के साथ-साथ ही राठौड़ राजपूत समाज से भी आते हैं और विषम परिस्थितियों में सब को एकजुट करने की कला भी उनके पास है. लेकिन राठौड़ को संघ का समर्थन नहीं है क्योंकि पूर्व में वह वसुंधरा राजे के नजदीकी हुआ करते थे. हालांकि बाद में कुछ दूरियां भी बन गई.

सतीश पूनिया- दूसरी पंक्ति में खड़े नेताओं में सतीश पूनिया का नाम भी शुमार है, जिसे संघ की पसंद भी माना जाता है. विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चल रही दौड़ में सतीश पूनिया का नाम भी जोर-शोर से सामने आया. संघ पृष्ठभूमि के सतीश पूनिया संगठन के कामकाज में माहिर हैं और संगठन में भी उनकी पुरानी पकड़ है. लिहाजा आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में सतीश पूनिया को भी सियासी कद बढ़ सकता है.

अरुण चतुर्वेदी- अरुण चतुर्वेदी का नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल है. अरुण चतुर्वेदी वसुंधरा राजे सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे पूर्व में प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. संगठन में अच्छी पकड़ के चलते और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नजदीकियों के चलते पार्टी उन्हें अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर प्रदेश के स्वर्ण समाज को एक मैसेज भी दे सकती है. हालांकि पिछला विधानसभा चुनाव अरुण चतुर्वेदी हार चुके हैं.

कैलाश मेघवाल दलित चेहरे के रूप में कैलाश मेघवाल को भी अब नई भूमिका में लाया जा सकता है. हालांकि मेघवाल 85 वर्ष के हो चुके हैं लिहाजा विधानसभा के भीतर ही उन्हें कोई जिम्मेदारी मिल सकती है. क्योंकि संगठन में ज्यादा कुछ करने के लिए मेघवाल के पास कुछ खास नहीं है.

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