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वसुंधरा यूं ही....हार...मानने वालों में नहीं है...बस कर रही हैं इस मौके का इंतजार

राजस्थान की राजनीति में भाजपा के प्रमुख चेहरे के रूप में सालों तक पार्टी की कमान अपने हाथ में रखने वाली पूर्व सीए वसुंधरा राजे अब दिल्ली की सियासत देखेंगी. लेकिन, पार्टी आलाकमान के इस निर्णय के बीच वसुंधरा की खामोशी ने सियासी चर्चाओं को बढ़ा दिया है....

वसुंधरा राजे।


जयपुर . राजस्थान की राजनीति में डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक एक क्षत्र राज करने वाली पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को भाजपा नेतृत्व ने राज्य की राजनीति से दूर करने की तैयारी कर ली है. पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर तय लक्ष्य की तरफ कदम भी बढ़ा दिया है. खास बात यह है कि चुनावी हार के बीच चुप्पी साधे हुए वसुंधरा राजे ने भी दिल्ली के निर्णय को स्वीकार करते हुए ट्वीट कर पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का आभार जताया है. वसुंधरा की चुप्पी के बीच जहां सियासी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. वहीं, जानकारों का कहना है कि वसुंधरा की चुप्पी भी उनकी राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है.
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साल 2002 में राजस्थान की सियासी जमीन पर आकर भाजपा की कमान अपने हाथ में लेते हुए वसुंधरा ने प्रदेश की राजनीति सक्रिय हुई. प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा ने 120 सीटें हासिल करते हुए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची. इसके बाद फिर वसुंधरा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. प्रदेश संगठन के भीतर हर दिन गुजरने के साथ ही उनकी पकड़ और गहरी होती चली गई. राज्य की राजनीति में वसुंधरा राजे ही भाजपा के मजबूत चेहरे के रूप में उभरकर सामने आई. संगठन पर शीर्ष से लेकर निचले इकाई तक उनकी पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2002 के बाद से 2018 तक दिल्ली से चलने वाला हर आदेश वसुंधरा की सहमति से ही जमीनी रूप ले पाया है. चाहे राजस्थान की राजनीति को लेकर कोई निर्णय रहा को या फिर कोई नियुक्ति. हर कहीं वसुंधरा राजे का सियासी प्रभाव देखने को मिला है. लेकिन, इस बार के चुनावी हार के बाद बदले समीकरण के बीच राजनीतिक रूप से कमजोर हुई वसुंधरा पर दिल्ली का दांव भारी रहा.

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चुनावी हार के बाद पहले नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाने का निर्णय और उसके बाद शाह की 17 समितियों में वसुंधरा को जगह नहीं देने और अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में राज्य की राजनीति से बाहर निकालने तक. दिल्ली एक के बाद एक दांव चलते हुए जहां अपनी मजबूती का संदेश देता रहा, वहीं, लगातार वसुंधरा पर शिकंजा भी कसता रहा. खास बात यह है कि सबकुछ जानने के बाद भी वसुंधरा राजे चुप हैं. इस बार उन्होंने दिल्ली को वो तेवर नहीं दिखाए जिसके लिए वसुंधरा राजे खासतौर पर पहचानी जाती हैं. राजनीति के जानकर उनकी इस चुप्पी के बीच राजनीतिक समीकरण की बात करते हैं. वे कहते हैं कि मुश्किल हालात में भी राजनीति को नियंत्रित करने की क्षमता रखने वाली वसुंधरा राजे अपने समीकरण के चलते ही खामोश हैं. वसुंधरा ने हार नहीं मानी है, बस वे एक अच्छे मौके के इंतजार में हैं. माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे लोकसभा चुनाव में सामने आने वाले परिणाम का इंतजार कर रही हैं.

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लोकसभा चुनाव का परिणाम यदि पीएम नरेंद्र मोदी के पक्ष में मजबूती से आया तो वसुंधरा को राजनीतिक रूप से दिल्ली के दिखाए राह पर ही आगे बढ़ना होगा. वहीं, दूसरी तरफ ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि लोकसभा चुनाव का परिणाम मोदी के पक्ष में मजबूती के साथ नहीं आया तो फिर वसुंधरा का नया रूप और तेवर देखने को मिल सकता है. जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद इस बार वसुंधरा राजनीतिक रूप से उस मजबूती में नहीं हैं, जैसा कि पहले रही हैं. इस बार दिल्ली मजबूत है. यही वजह है कि चुनावी हार के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा को राज्य की राजनीति से हटाते हुए उनकी जगह नए नेता को खड़ा करने की तैयारी कर ली है. जिसे वसुंधरा राजे ने भी पूरी खामोशी के साथ स्वीकार कर लिया है.


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